कायम रहे आलोचना की परंपरा
प्रीतीश नंदी | Nov 09, 2012, 03:45AM IST

पिछले हफ्ते मुंबई साहित्य समारोह के दौरान गिरीश कर्नाड ने वीएस नायपॉल के बारे में जो कुछ कहा, उससे मैं पूरी तरह इत्तफाक नहीं रखता, मगर इसके प्रति जिस तरह का आक्रोश जताया गया, उसे देखकर मुझे जरूर हैरत हुई।
कर्नाड की बातों से कई लोग इसलिए भी असहमत रहे होंगे, क्योंकि उन्होंने ऐसे मंच से अपनी बात कही, जहां पर नायपॉल को लाइफटाइम एचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा कर्नाड को वहां पर रंगमंच से जुड़े अपने अनुभवों के बारे में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था, जो बिलकुल जुदा विषय था।
मगर जब आप कर्नाड जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति को किसी मंच पर बोलने के लिए आमंत्रित करते हैं तो आपको अन्य मुद्दों पर भी उनके विचार जानने के लिए तैयार रहना चाहिए। कर्नाड संभवत: हमारे द्वारा नायपॉल के प्रशस्ति-गान से काफी व्यथित थे, जिन्हें हम भारतीय लेखक की तरह निरूपित करते हैं। हालांकि खुद नायपॉल ने वास्तव में कभी ऐसा नहीं माना।
नायपॉल का भारत के प्रति लगाव बहुत कम अवसरों पर ही जाहिर हुआ है। वह इसे ऐसे महान हिंदू राष्ट्र के तौर पर देखते हैं, जिसे मुस्लिम आक्रांताओं ने अपना वर्चस्व कायम करते हुए भ्रष्ट कर दिया। वह हिंदू पुनरुत्थान के सपने देखते हैं। इससे मुझे कोई दिक्कत नहीं है। मैं भी कभीकभार ऐसा सोचता हूं। लेकिन वह इस्लाम के प्रति अजीब दुराग्रह से पीड़ित हैं।
कोई आश्चर्य नहीं कि नोबेल पुरस्कार जीतने के बाद उन्होंने एक शुरुआती काम यह किया कि वह भारत आए और भाजपा के ऑफिस पहुंच गए। जैसा कि कर्नाड ने बड़े अर्थपूर्ण ढंग से इंगित किया कि जिस शख्स ने कभी कहा था कि वह राजनीतिक नहीं है, क्योंकि वह किसी एक विचारधारा से प्रेरित नहीं हो सकता, वही शख्स बाद में अयोध्या प्रकरण को महान सृजनात्मक जुनून बताता है। ऐसे में कोई आश्चर्य की बात नहीं कि सलमान रुश्दी ने उन्हें नोबेल पुरस्कार दिए जाने की आलोचना की थी।
लेकिन मेरा यह लेख नायपॉल की राजनीति के बारे में नहीं है। न ही यह कर्नाड के किसी ऐसे लेखक के प्रति दुराव के बारे में है, जिसे दुनिया सर्वश्रेष्ठ लेखकों में से एक मानती है। भले ही यह लेखक एक सनकी बोर बुजुर्ग हों। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि वास्तव में शायद ही कुछ ऐसा है, जिसे नायपॉल पसंद करते हों। मुझे नायपॉल के नोबेल पुरस्कार जीतने पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि पश्चिमी जगत ऐसे ही लेखकों को पसंद करता है, जो उनका अनादर करते हैं और नायपॉल तो इसमें दूसरों से एक कदम आगे हैं। वह हर चीज का अनादर करते हैं, जो इस तरह के पुरस्कार जीतने का उचित कारण है। हालांकि कर्नाड ने जिस तरीके से उनकी आलोचना की, वह मुझे जरूर अच्छा लगा। लेखकों को अक्सर ऐसा करते रहना चाहिए। जो कुछ भी उन्हें गलत, अनैतिक, अन्यायपूर्ण अथवा बेतुका नजर आता हो, उसकी आलोचना का एक भी मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहिए।
लेकिन दिक्कत यह है कि हममें से ज्यादातर लोग ऐसा करने से कतराते हैं। यह पलायनवादी व गैर-जिम्मेदार रवैया है। लेखक, कलाकार, अभिनेता, संगीतकार इत्यादि तो राष्ट्र की चेतना हैं। उन्हें राजनीतिक प्रतिष्ठानों का पिछलग्गू बनते देखना और लगातार बिगड़ते माहौल में तुच्छ चीजों पर रट्टू तोते की तरह बोलते देखना शर्मनाक लगता है। इसी का नतीजा है कि हर साल बड़ी संख्या में हमारे राष्ट्रीय पुरस्कार चाटुकारों और तलवे चाटने वालों के हिस्से में चले जाते हैं, जबकि असल प्रतिभाएं इससे वंचित रह जाती हैं। जो लोग वास्तव में प्रतिभाशाली होते हैं, उन्हें तो उनके जीवन के संध्याकाल में ही सम्मान मिल पाता है। वह भी तब जबकि उन्हें और ज्यादा नजरअंदाज करना संभव नहीं रह जाता।
सोचिए कितनी विसंगति है कि ऋत्विक घटक को महज ‘पद्मश्री’ मिलता है और सफदर हाशमी को कुछ भी नहीं मिलता, जबकि संत चटवाल ‘पद्म भूषण’ तथा प्रणब मुखर्जी ‘पद्म विभूषण’ (जो ‘भारत रत्न’ के बाद देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है) से नवाजे जाते हैं। आप एक काम करें। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं की सालाना सूची पर जरा नजर दौड़ाएं। इसमें आपको हिस्ट्रीशीटरों के साथ-साथ ऐसे लोग भी मिल जाएंगे, जिनके खिलाफ सीबीआई ने मुकदमे दायर कर रखे हैं। इनका स्तर इतना गिर चुका है कि मीडिया ने तो अब पूरी सूची भी देनी बंद कर दी है। हालांकि मैं आपको ऐसे सैकड़ों महान भारतीयों के नाम गिना सकता हूं, जिन्हें कभी कोई सम्मान नहीं मिला, क्योंकि अब वास्तविक प्रतिभा विचारणीय ही कहां रही! अब तो सिर्फ चाटुकारिता पुरस्कृत होती है। हरेक सरकारी पुरस्कार उन्हीं के सर्किल में शामिल अधकचरी प्रतिभाओं को मिलता है। इन पुरस्कारों को पाने के लिए हर शख्स को ‘कोड ऑफ ओमेर्ता’ का पालन करना पड़ता है, जिसके तहत सार्वजनिक तौर पर कुछ भी गलत बोलने की मनाही होती है।
मुझे खुशी है कि गिरीश कर्नाड ने ‘कोड ऑफ ओमेर्ता’ को तोड़ा। मैं चाहता हूं कि दूसरे लोग भी ऐसा करने की हिम्मत करें। एक समय था, जब हमारे पास तीक्ष्ण आलोचक हुआ करते थे, जो हर उपलब्ध मंच से बेलाग अपनी राय पेश करते थे। ऐसा अब भी होना चाहिए। इससे ही सार्वजनिक संभाषण का स्तर सुधर सकता है और इसी से हमें यह सीख मिलेगी कि एक मुक्त समाज में ऐसे कुछ परमादरणीय, टीका-टिप्पणी से परे समझे जाने वाले लोगों के हनन में कोई बुराई नहीं है। यही कारण है कि जो कुछ कर्नाड ने किया, वह मुझे अच्छा लगा।
प्रीतीश नंदी
वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार






