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इस लड़ाई के क्या मायने हैं?

 
Source: प्रीतीश नंदी   |   Last Updated 00:17(01/09/11)
 
 
 
 
अब जब हम यह सोचने लगे हैं कि हमने भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में जीत हासिल कर ली है, हमारे लिए बेहतर होगा कि हम थोड़ा रुकें और खुद से पूछें कि आखिर भ्रष्टाचार होता क्या है। क्या मायने हैं भ्रष्टाचार के? जंग की जरूरत के नाम पर लड़ाइयां लड़ीं और जीती जाती रही हैं।

जिस तरह हम अपने अविश्वास को स्थगित किए बिना किसी फिल्म का मजा नहीं ले सकते, ठीक उसी तरह हम कोई लड़ाई इस तरह नहीं लड़ सकते कि हम पहले जीत की घोषणा कर दें और फिर उसके बाद यह पूछने लगें कि आखिर हम लड़ किसलिए रहे थे, फिर चाहे हमारे इरादे कितने ही नेक और हमारे मंसूबे कितने ही भले क्यों न हों?

इससे पहले कि आप मुझ पर यह आरोप लगाएं कि मैं अन्ना का समर्थन नहीं कर रहा हूं, कृपया पहले मुझे स्पष्टत: यह स्वीकारने की अनुमति दीजिए कि यकीनन भ्रष्टाचार आज हमारे जीवन और राजनीतिक तंत्र के लिए सबसे घातक तत्व बन चुका है। भ्रष्टाचार के कारण आज हर भारतीय परेशान है, फिर चाहे वह कितना ही अमीर या गरीब क्यों न हो। इसीलिए अन्ना के आंदोलन ने हर दिल को छुआ।

मौजूदा परिदृश्य में कोई वास्तविक खलनायक नहीं हैं, बल्कि सभी किसी न किसी अर्थ में व्यवस्था के शिकार हैं। भ्रष्टाचार केवल आपकी या मेरी या किन्हीं इने-गिने लोगों की समस्या नहीं है। यह पूरे देश की समस्या है। वास्तव में देखा जाए तो यह उन लोगों की भी समस्या है, जो घूस खा रहे हैं।

मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा। जो पुलिसवाला ट्रैफिक सिग्नल पर आपसे पचास रुपए की रिश्वत लेता है, उस पर हम नाराज हो सकते हैं। उसकी लानत-मलामत कर सकते हैं। लेकिन याद रखें, यह वही पुलिसवाला है, जिसने किसी स्थानीय सूदखोर से मोटी ब्याज दर पर एक लाख रुपए उधार लिए थे, ताकि पहले तो वह नौकरी पाने के लिए रिश्वत दे सके और फिर एक मलाईदार पोस्टिंग पाने का भी प्रयास करे, ताकि वह अपना कर्ज चुका सके।

वह अपनी नौकरी और अपनी पदस्थापना के लिए जो पैसा चुकाता है, वह सीधा उसके बॉस की जेब में जाता है। यह शोषण की एक श्रंखला है। हम देख सकते हैं कि हर व्यक्ति इस श्रंखला की एक कड़ी है, फिर चाहे वह घूस लेने वाला हो या फिर घूस देने वाला, शोषक हो या शोषित।

रिश्वत की दरकार अरबों डॉलर मूल्य के टेलीकॉम लाइसेंस के लिए ही नहीं होती। एक सामान्य-सा पासपोर्ट बनवाने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है। एक राशन कार्ड बनवाने के लिए भी घूस खिलानी पड़ती है। स्कूल में दाखिला पाने के लिए भी पैसे देने पड़ते हैं। रिश्वत के बिना न ड्राइविंग लाइसेंस मिलता है, न जन्म और मृत्यु का प्रमाण-पत्र।

यदि आप भ्रष्टाचार के विरोध में शिकायत दर्ज करवाना चाहते हैं, तो इसके लिए भी रिश्वत देनी पड़ेगी। यदि आपके पास पहले ही एक पासपोर्ट या ड्राइविंग लाइसेंस है तो उसके नवीनीकरण के लिए भी आपको जेब ढीली करनी होगी। यदि आपके पास राशन कार्ड है, तब भी अपना साप्ताहिक राशन पाने के लिए आपको कोई न कोई कीमत चुकानी पड़ सकती है।

आपके बच्चे को स्कूल में दाखिला मिल जाए, उसके बाद भी आपको यह सुनिश्चित करने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है कि कहीं भ्रष्ट शिक्षक या स्कूल प्रबंधन से संबद्ध कोचिंग क्लासेस उसकी शैक्षिक प्रगति में अवरोध न डालें। जब मैं कॉलेज में था और मुझे यह पता चला था कि नेशनल साइंस स्कॉलर को कभी समय पर पैसा नहीं मिलता और वे कॉलेज की फीस नहीं भर पाते तो मैंने वह कॉलेज छोड़ दिया था। स्कॉलर्स बहुत देरी से छात्रवृत्ति मिलती थी और कॉलेज की फीस चुकाने के लिए उन्हें माता-पिता की आय या पेंशन पर निर्भर रहना पड़ता था। मेरी भी यही स्थिति थी।

लेकिन भ्रष्टाचार की इन रोजमर्रा की घटनाओं के परे कुछ गंभीर आंकड़ों पर नजर डालते हैं। दुनिया की 70 फीसदी नकली दवाइयां भारत में बनाई जाती हैं। अधिकतर भारतीय महंगे इलाज का खर्चा नहीं उठा सकते और वे तब तक डॉक्टर के पास नहीं जाते, जब तक कि उनकी स्थिति बहुत खराब न हो जाए। आप कल्पना कर सकते हैं ऐसी स्थिति में वे दवाइयां उनके लिए कितनी घातक साबित हो सकती हैं, जो वे बिना किसी चिकित्सकीय परामर्श के ले लेते हैं।

कई लोग महंगी दवाइयों के कारण जान गंवा देते हैं और कई लोग नकली दवाइयों के कारण। कई लोगों को उन अनाड़ी डॉक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन का खमियाजा भुगतना पड़ता है, जो घूस खिलाकर पास हुए हैं। ऐसे सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के बीच हम कैसे रह सकते हैं? युद्ध में शहीद होने वाले जवानों की विधवाओं को भी पेंशन पाने के लिए क्लर्को को रिश्वत देनी पड़ती है।

लेकिन इसके बावजूद अगर देश चल रहा है, तो इसकी वजह है वे नैतिक और ईमानदार लोग, जो संख्या में भले ही कम हों, लेकिन आज भी सच्चाई के साथ हैं। या हो सकता है, उन लोगों की तादाद वास्तव में इतनी कम न हो। लगभग सवा अरब लोगों के देश में आंकड़ों का सही-सही अनुमान लगा पाना वैसे भी आसान नहीं है। लेकिन अगर ये चुनिंदा लोग तंत्र को बदल न पाए तो भ्रष्टाचार का रोग इसी तरह फैलता रहेगा। इसकी एक वजह यह भी है कि हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं, जो केवल सफलता और समृद्धि को ही महत्व देता है। इनकी तुलना में अन्य सभी चीजों का महत्व कम माना जाता है।

भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई वास्तव में हमारे पारंपरिक मूल्यों को बचाने की लड़ाई है। यह हमारे अधिकारों, हमारी धरती, हमारे वनों, हमारे न्याय तंत्र और हमारे आत्मविश्वास के संरक्षण की लड़ाई है। यदि हमने इन्हें गंवा दिया, यदि हमने अपनी स्वतंत्रता और अस्मिता को गंवा दिया तो सफलता, समृद्धि और प्रसिद्धि का भी आखिर क्या मोल रह जाएगा?
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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