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जब शास्त्रीजी ने श्रमिक स्त्रियों के श्रम को मान दिया

Bhaskar news | Apr 27, 2012, 00:04AM IST
 
 

जीवन दर्शन.. लालबहादुर शास्त्री की सहृदयता विख्यात है। उन्हें छोटे-से-छोटे इंसान के कष्टों और समस्याओं की बहुत परवाह रहती थी और वे सदैव उनके समाधान की दिशा में सक्रिय रहते थे। कभी कोई परेशानी में हो और यह शास्त्रीजी की जानकारी में हो, तो वे शांत होकर बैठ ही नहीं सकते थे।

जब वे देश के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हुए, तो भी उनका यह व्यवहार कायम रहा। उनके हृदय, उनकी दृष्टि और उनकी सोच में केंद्रीय पात्र की तरह आम आदमी ही रहा। यह घटना उस समय की है, जब शास्त्रीजी केंद्रीय गृहमंत्री थे। उनके निवास की रचना कुछ ऐसी थी कि एक दरवाजा जनपथ की ओर तो दूसरा अकबर मार्ग की ओर था।



एक दिन दो श्रमिक स्त्रियां सिर पर घास का भारी गट्ठर लेकर उनके निवास की ओर से जाने वाले छोटे रास्ते से जाने का प्रयास कर रही थीं, किंतु चौकीदार उन्हें मना कर भगाने लगा। शास्त्रीजी बाहर ही बैठे कुछ काम कर रहे थे। उन्होंने सुना तो चौकीदार को बुलाकर कहा - Rभाई! देखते नहीं हो, उनके सिर पर कितना बोझ है? वे छोटे रास्ते से जाना चाहें, तो जाने दो।ञ्ज दोनों स्त्रियां उन्हें आशीष देती हुईं उस मार्ग से चली गईं।


यह छोटी, किंतु महत्वपूर्ण घटना यह सिखाती है कि अपनी विशिष्ट सुविधाओं को आम जनता के लिए उपलब्ध कराना एक ऐसा बड़प्पन है, जो पद से आगे बढ़कर हमारा कद ऊंचा करता है और तब संबंधित व्यक्ति जन-जन के हृदय में श्रद्धा का पात्र बनकर उच्च स्थान हासिल कर लेता है।
 
 
 

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