किसे कसूरवार मानें किसे नहीं
Source: प्रीतीश नंदी | Last Updated 00:09(07/07/11)
वर्ष 1959 में हुई कत्ल की एक वारदात ने पूरे भारत का ध्यान अपनी ओर खींचा था। इस घटना ने कई सार्वजनिक बहसों को भी जन्म दिया था। बहस इस संबंध में नहीं की जा रही थी कि कातिल को कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए या नहीं।
बहस इस बारे में हो रही थी कि क्या उसे सम्मान के साथ बरी कर दिया जाना चाहिए। विवाद के केंद्र में था एक नौसेना अधिकारी (कुछ-कुछ एमिल जेरोम की ही तरह, लेकिन उससे कहीं अधिक उम्रदराज। वह एक नौसेना कमांडर था और डिफेंस अटैची के रूप में भी कार्य कर चुका था।)
उसका नाम भारतीय आपराधिक कानून के ब्योरों में बरकरार है, जिसके कारण किसी भी न्यायाधीश के लिए यह फैसला सुना पाना कठिन हो जाता है कि वह हत्या और आवेशवश किए गए अपराध में अंतर कैसे कर पाए।
हत्या निश्चित ही जघन्य कृत्य है, लेकिन आवेश में आकर किया गया कोई भी कृत्य इसी श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस तरह की वारदातें कभी सोच-समझकर नहीं की जातीं, वे आवेश के किसी क्षण में दुर्घटनावश घटित हो जाती हैं।
यह एक अप्रत्याशित क्षण में हुआ अपराध है, जिसके लिए आमतौर पर कुछ नैतिक स्पष्टीकरण भी होते हैं। लेकिन अपराध इसके बावजूद अपराध ही होता है और अपराधी को दंडित किया भी जाना चाहिए, क्योंकि समाज अभी तक ठीक से यह नहीं जानता कि हत्या की दो अलग-अलग वारदातों में कैसे अंतर किया जाए। ज्यादा से ज्यादा वह इतना ही करता है कि अपराधी की सजा को थोड़ा कम कैसे किया जा सके।
कमांडर नानावटी के केस पर पहले ज्यूरी ने सुनवाई की थी। ज्यूरी के आठ सदस्यों ने नानावटी के पक्ष में राय दी, जबकि एक ने उनका विरोध किया था। क्रुद्ध राज्य सरकार ने न केवल अपील दायर की, बल्कि ज्यूरी की सुनवाइयों को भी खारिज कर दिया।
मामला हाईकोर्ट में गया, जहां नानावटी को दोषी करार दिया गया। वर्ष 1961 में सुप्रीम कोर्ट ने इस बुनियाद पर हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा कि नानावटी ने अपनी पत्नी और बच्चों को फिल्म देखने के लिए रवाना कर दिया, जबकि वह स्वयं बंदूक उठाकर अपनी पत्नी के प्रेमी से मुठभेड़ करने पहुंच गया। दोनों के बीच झड़प हुई।
जब नानावटी ने उस व्यक्ति से यह सवाल पूछा कि क्या वह उसकी पत्नी से विवाह करेगा और उसके बच्चों की परवरिश करेगा तो उसने अक्खड़ता के साथ जवाब दिया कि क्या मुझे अपनी हर प्रेमिका के साथ विवाह करना पड़ेगा? इस पर नानावटी ने उस पर तीन गोलियां दाग दीं।
वारदात के बाद नानावटी ने आत्मसमर्पण कर दिया, लेकिन यह बात उसके पक्ष में नहीं गई। इसके विपरीत इसने अभियोजन के इस तर्क को और मजबूत ही किया कि वारदात सुनियोजित और सुविचारित थी। हालांकि इस मामले में जनता की धारणा कुछ और ही थी। तीन साल बाद राज्यपाल द्वारा नानावटी को दोषमुक्त कर दिया गया।
मारिया सुसाईराज की कहानी काफी हद तक इससे मिलती-जुलती है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह भी आवेश में आकर की गई वारदात है। फैसला इस आधार पर न्यायोचित लगता है कि एमिल जेरोम ने सुनियोजित रूप से हत्या नहीं की थी। वह केवल अपनी गर्लफ्रेंड को सरप्राइज देने के लिए आया था।
कत्ल की वारदात हाथापाई के बाद हुई, जैसा कि सबूतों से पता चलता है। कत्ल के बाद क्या हुआ, यह कोई नहीं जानता, और मैं एक पत्रकार के रूप में कभी पुलिस की कहानी से सौ फीसदी संतुष्ट नहीं हो सकता। इस मामले में व्यक्त हो रहा आक्रोश अटकलों पर आधारित है, तथ्यों पर नहीं।
कत्ल के बाद मारिया और जेरोम ने यौन संबंध बनाए या सबूत छिपाने के लिए लाश के तीन सौ टुकड़े कर दिए वगैरह-वगैरह, ये सब फंतासी लोक की बातें जान पड़ती हैं। इन बातों के कोई सबूत नहीं हैं। सच्चाई केवल तीन लोग जानते हैं, जिनमें से एक की मौत हो चुकी है।
मुझे लगता है इस तरह की भयावह कहानियां अक्सर गढ़ ली जाती हैं, क्योंकि हकीकत आमतौर पर इतनी लार्जर दैन लाइफ या रोमांचक नहीं होती। हां, यह जरूर है कि सच्चाई से कोई सनसनीखेज कहानी नहीं गढ़ी जा सकती, लिहाजा पुलिस, मीडिया, सिनेमा सभी यह कोशिश करते हैं कि किसी कहानी को ज्यादा से ज्यादा चटखारेदार बनाया जाए।
जो कुछ हुआ, वह दुखद था। ग्रोवर परिवार के लिए तो यह एक बहुत बड़ा आघात था। हमें उनके दुख में शामिल होना चाहिए और उनके प्रति संवेदना जतानी चाहिए। लेकिन इसके साथ ही हमें वैधानिक तरीके से अपना बचाव करने के हर व्यक्ति के अधिकार की रक्षा भी करनी चाहिए। मारिया अदालत का सामना कर चुकी है और काफी हद तक अपनी सजा भी भुगत चुकी है। उसने दुर्दात अपराधियों के साथ 3 साल 14 दिन जेल में बिताए हैं और अब जब उसे बरी कर दिया गया है, उसे अस्मिता के साथ जीवन बिताने का अधिकार होना चाहिए।
यदि हमें लगता है कि उसे मिली सजा अपर्याप्त है तो अपील करने के लिए उपयुक्त स्थान है उच्चतर अदालतें, ठीक वैसे ही जैसे नानावटी केस में हुआ था। लेकिन किसी महिला को प्रताड़ित करना, उसे प्रेस कांफ्रेंस में बोलने की अनुमति नहीं देना, उसे हत्यारिन कहकर पुकारना, जबकि हमारे पास इस आक्षेप के कोई सबूत न हों और अदालत के फैसले का मखौल उड़ाना अनुचित है। हम एक कानून सम्मत देश के नागरिक हैं, बिना सुनवाई फैसला सुना देने वाले लोगों का समूह नहीं।
जेरोम अब दस साल के लिए सलाखों के पीछे है। कत्ल के सबूत नष्ट करने में उसकी मदद करने वाली मारिया अपनी सजा भुगत चुकी है। अब समय आ गया है कि हम उसके साथ उपयुक्त व्यवहार करें। यदि हमें लगता है कि उसे और सजा मिलनी चाहिए तो हमें एक जनहित याचिका दायर करनी चाहिए। लेकिन हमें एक ऐसी महिला को प्रताड़ित करने का अधिकार नहीं है, जो पहले ही अपने किए की पर्याप्त सजा भुगत चुकी है।