शिक्षा की राह में रोड़े क्यों?
Source: चेतन भगत | Last Updated 00:11(06/10/11)
पिछले हफ्ते आईआईटी दिल्ली के डायरेक्टर ने अपने एक लेख में आईआईटी में प्रवेश की प्रक्रिया में सुधार की जरूरत पर जोर दिया था। अब नारायण मूर्ति ने भी आईआईटीयंस की घटती गुणवत्ता पर टिप्पणी की है। लगता है हमारा ध्यान आईआईटी पर कुछ ज्यादा ही केंद्रित है, लेकिन हमें उच्च शिक्षा के अन्य आयामों की भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
यदि कुछ एलीट कॉलेजों को छोड़ दें तो हमारे यहां उच्च शिक्षा का स्तर सवालों के दायरे में है। कॉपरेरेट्स से पूछें तो वे प्रतिभाओं के टोटे की बात कहेंगे। विद्यार्थियों से पूछें तो वे अच्छे जॉब्स के अभाव का रोना रोएंगे। जाहिर-सी बात है, विद्यार्थियों को दी जा रही पढ़ाई इस स्तर की नहीं है कि वह उन्हें वैश्वीकृत दुनिया की मांगों के अनुरूप बना सके। इस बात पर तो लगभग सभी सहमत हैं कि शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए कुछ किया जाना चाहिए, लेकिन अजीब बात यह है कि इस दिशा में न के बराबर प्रयास किए जा रहे हैं। शिक्षा पर व्यय की जाने वाली राशि पर कभी सवाल नहीं उठाए जाते।
यह एक राजनीतिक मसला नहीं है और न ही इसमें सुधार करना भ्रष्टाचार से निजात पाने की तरह जटिल है। हमारे यहां कुछ बहुत अच्छे व प्रतिष्ठित कॉलेज हैं और हमारी कई प्रतिभाएं इन कॉलेजों से निकलकर आती हैं, लेकिन बाकी के बारे में क्या? हम शायद खुद से यह नहीं पूछते कि उन लाखों अन्य विद्यार्थियों का क्या हुआ, जो अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सके। अनेक विद्यार्थी निजी कॉलेजों में पढ़ाई करते हैं।
ये कॉलेज विद्यार्थियों को उनकी पसंद की डिग्री प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं। इसमें कुछ गलत है भी नहीं। वास्तव में यह तो अच्छी बात है कि निजी क्षेत्र शिक्षा के विकास में अपनी भूमिका निभा रहा है। लेकिन इन शैक्षिक संस्थानों की गुणवत्ता क्या है, यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है। पिछले दशक में हजारों निजी कॉलेज खुले हैं। अकेले एनसीआर (नेशनल केपिटल रीजन) में ही आज सौ से अधिक एमबीए कॉलेज हैं। ऐसे में अगर इन संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता उन्नीस-बीस पाई जाती है तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।
विद्यार्थियों की खासी तादाद को देखते हुए इन कॉलेजों की मांग बनी हुई है, लेकिन वे विद्यार्थियों को क्या पढ़ा रहे हैं और विद्यार्थी उनसे क्या सीख रहे हैं, यह एक दूसरा मसला है। शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने अनुमोदन और जांच प्रक्रियाओं की एक प्रणाली बनाई है, लेकिन भ्रष्टाचार के कारण वह बेअसर हो जाती है। कई निजी कॉलेज संचालकों ने मेरे सामने व्यक्तिगत रूप से स्वीकारा है कि उन्हें कॉलेज खोलने के लिए हर कदम पर रिश्वत देनी पड़ी थी, फिर चाहे भूमि या निर्माण संबंधी अनुमतियां प्राप्त करनी हों, पाठच्यक्रम को मंजूरी दिलाना हो या शुल्क प्रणाली तय करनी हो।
इस भ्रष्टाचार का एक बड़ा कारण है निजी संस्थाओं के लिए सरकार की ‘नो प्रॉफिट अलॉउड’ नीति। इसलिए हर शैक्षिक संस्था को नॉन-प्रॉफिट ट्रस्ट की तरह संचालित किया जाता है। तकनीकी रूप से आप कॉलेजों से धन नहीं कमा सकते। न जाने क्यों सरकार ने यह मान लिया है कि देश में ऐसे लोग पर्याप्त संख्या में होंगे, जो महज नेकी की भावना के चलते ही लाखों विद्यार्थियों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हजारों करोड़ रुपए खर्च कर अच्छे कॉलेज खोलेंगे। हमारे देश की उच्च शिक्षा इसी दोषपूर्ण धारणा पर आधारित है कि लोग अच्छे कॉलेज खोलने के लिए तत्पर हैं और उन्हें पैसा कमाने की कोई जरूरत नहीं है।
जाहिर है, इस तरह का नो प्रॉफिट व्यवसाय संभव नहीं है। होता केवल इतना ही है कि पैसा कमाने के दूसरे तरीके अख्तियार कर लिए जाते हैं। कालाधन, फर्जी भुगतान, व्ययों का अधिक मूल्यांकन आदि ऐसे ही तरीके हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रमोटर्स को उनके द्वारा किए गए निवेश का रिटर्न मिल सके। साथ ही इससे यह भी तय हो जाता है कि कानूनी तौर-तरीकों में विश्वास रखने वाले लोग इस क्षेत्र में रुचि नहीं लेंगे। पूर्व शिक्षाविद्, विश्वस्तरीय कॉपरेरेट्स और ईमानदार लोग कभी निजी शिक्षा की ओर झांककर नहीं देखेंगे, क्योंकि वे हर कदम पर घूस नहीं दे सकते और न ही नियम-कायदों को गच्चा देने के तौर-तरीके अख्तियार कर सकते हैं। इसलिए देशी शराब का ठेका लेने वाले, साड़ी निर्माता, मिठाईवाले किस्म के व्यवसायी इंजीनियरिंग और मेडिसिन के लिए टेक्निकल कॉलेज खोलते हैं और हम अपने बच्चों का भविष्य उनके हाथों में सौंप देते हैं।
इस स्थिति को समझने के लिए हमारा कोई विशेषज्ञ होना जरूरी नहीं है, लेकिन इसके बावजूद नीति-निर्माता हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। शायद मौजूदा व्यवस्था से इतनी बड़ी तादाद में रेगुलेटर्स और इंस्पेक्टर्स पैसा कमा रहे हैं कि कोई भी इसमें सुधार करना नहीं चाहता। लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार की समस्या को हल्के में नहीं लिया जा सकता। जब बुनियादी ढांचे में भ्रष्टाचार होता है तो इसका परिणाम होता है गड्ढोंभरी सड़कें। लेकिन जब शिक्षा में भ्रष्टाचार होता है तो इसका परिणाम होता है गड्ढोंभरे दिमाग। यह हमारी युवा पीढ़ी का अधिकार है कि उसे विश्वस्तरीय शिक्षा दी जाए, लेकिन हम ऐसा न कर उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
मुझे शिक्षा के व्यवसायीकरण से कोई आपत्ति नहीं, लेकिन इसमें नैतिकता और गुणवत्ता का ध्यान रखा जाना चाहिए। अच्छे लोगों को प्रेरित किया जाना चाहिए ताकि वे कॉलेज खोलने में रुचि दिखाएं। एक सीधी-सरल नीति यह होनी चाहिए कि निजी संस्थाओं को लाभ कमाने की अनुमति दी जाए। यदि ऐसा होगा तो इंफोसिस और रिलायंस जैसी कंपनियां बड़े पैमाने पर कॉलेज खोलेंगी और इसके लिए जरूरी निवेश में शेयरहोल्डर्स का भी योगदान होगा। यदि ये कंपनियां कॉलेज खोलती हैं तो माना जा सकता है कि उनकी एक गुणवत्ता और एक निश्चित स्तर होगा। यह किया जा सकता है। किया ही जाना चाहिए। भारत को अच्छी शिक्षा की जरूरत है और महज साझा इच्छाशक्ति और कुछ अच्छी नीतियों की सहायता से ऐसा संभव है। इसके लिए किसी अनशन, यात्रा या धरने की जरूरत नहीं है।