मतदाता के मेनु से एक मसाला गायब क्यों है?
Source: एम.जे. अकबर | Last Updated 00:38(05/02/12)
एक ऐसा एक्जिट पोल है, जिसे देश का कोई भी निर्वाचन आयुक्त प्रतिबंधित नहीं कर सकता। यह कहलाता है, जबानी चर्चा। यह चुनावी भाषण देते नेताओं के मुंह से निकलकर नहीं आती, न ही हवा में उड़ने वाले पत्रकारों की ओर से। यह उभरती है उनकी ओर से, जिनके पैर जमीन पर दृढ़ता से जमे होते हैं- मतदाता, जिन्होंने अपनी बहुमूल्य राय को निर्णय के दिन तक चौकन्नी गोपनीयता के साथ बचाए रखा। चूंकि अब यह अभिमत दे दिया गया है, इसलिए वे इस पर अपने चिर-परिचित सामुदायिक केंद्रों, यानी चाय की गुमटियों पर चर्चा के लिए खुशी से तैयार हैं।
नौसिखिए, शौकीन और बाहरी (जिसका मतलब है, हममें से 90 प्रतिशत लोग) नतीजों की औपचारिक घोषणा का इंतजार करते हैं। चुनाव रूपी चिकने खंभे के चारों ओर बड़ी घनिष्टता से जुड़े रहने वाले सक्रिय लोगों की छोटी-सी जमात, यानी पेशेवर लोग तो मतदान वाले दिन सूरज ढलते ही जान जाते हैं कि क्या हुआ है। यदि खबर अपने पक्ष के लिए बुरी होती है, तो पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता परेशान हो सकते हैं और इस बारे में बातें भी कर सकते हैं। यह समझा जा सकता है कि संकेत नकारात्मक होने पर क्यों प्रत्याशी उसे स्वीकार नहीं करना चाहते। वे चुनाव प्रक्रिया में बहुत ज्यादा भावनात्मक पूंजी लगा चुके होते हैं।
यदि वर्तमान में चुनाव प्रक्रिया के दौरान एक्जिट पोल पर प्रतिबंध का उद्देश्य किसी उपक्षेत्र के अनुमानित नतीजे का असर अगले हफ्ते मतदान वाले अन्य क्षेत्र पर पड़ने से रोकना है, तो फिर यह कारगर नहीं है, खासतौर पर तब, जब मतदान प्रक्रिया उत्तरप्रदेश सरीखे विशाल और जटिल राज्य में माहभर तक चलनी हो।
इस बार मतदान हिमालय के नीचे और गंगा के उत्तर में अर्धवृत्त से शुरू हो रहा है और पश्चिम में चक्कर पूरा करने से पहले विभिन्न चरणों में पूर्व और मध्य की ओर पहुंचेगा। दूसरे चरण के वोटर 48 घंटे के भीतर ही जान जाएंगे कि पहले चरण में जिन क्षेत्रों में मतदान हुए, वहां पार्टियों और प्रत्याशियों का प्रदर्शन कैसा रहा। वे ऐसा बस और रेलगाड़ियों के रास्तों के जरिए जानेंगे, जो जबानी चर्चा को ढोने वाले वाहन हैं।
मतदान के स्वरूपों पर आखिर यह किस हद तक असर डालता है? जिस पार्टी के पक्ष में हवा नजर आती है, निश्चित तौर पर उसे कुछ समानांतर फायदे तो मिलते ही हैं। विजय की अनुभूति एक से दूसरे तक फैल सकती है, लेकिन इसके साथ ही यह पिछड़ने वालों को और ताकत झोंकने के लिए उत्साहित भी करता है, जबकि खुशकिस्मत लोग इस दौरान हो सकता है कि समय से पहले ही खुद को बधाई देने में व्यस्त हो जाएं।
इसकी शानदार मिसाल 2004 में मिली, जब कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए ने पिछड़ने के बाद आम चुनाव के तीसरे और चौथे चरण में सरककर अंतिम क्षणों में एनडीए को बहुत कम अंतर से पछाड़कर स्तब्ध कर दिया था। यूपीए ने सौभाग्य का बढ़िया तरीके से लाभ उठाया, जबकि एनडीए को अभी इस झटके से उबरना है। किसी निर्वाचन क्षेत्र के स्तर पर बात करें, तो 2009 के चुनावों में जब वाराणसी के मध्य वर्ग को एहसास हुआ कि मुरली मनोहर जोशी एक माने हुए माफिया डॉन से पिछड़ रहे हैं, तो जनता जागी और मतदान केंद्रों की ओर भागी।
लोकतंत्र की कुंजी एकदम सामान्य है, लेकिन अक्सर इसे गलत समझ लिया जाता है। वोटर पार्टियों को वोट नहीं देते, वे खुद के लिए वोट करते हैं। वे तो उस समय की राजनीतिक सूची में से उस पार्टी को चुनते हैं, जो उनके निजी हितों के सबसे करीब लगती हो। मतदाताओं के पास अपना मन होता है।
लोकतंत्र उन्हें इसे बदलने का अधिकार देता है। बुनियादी प्रवृत्ति व्यक्तिगत है, न कि पार्टीगत। और यही कारण है कि क्यों चुनाव इतनी जोशीली, गुंजायमान और जीवंत अद्भुत घटना होते हैं। किसी भी चुनाव का परिणाम बाढ़ की तरह होता है, वह बाढ़, जो एक बार में बारिश की एक बूंद करके बनती है।
वोटर संदर्भ से चलता है। यूपी या पंजाब के वोटर को वास्तव में यह निष्कर्ष निकालने के लिए सुप्रीम कोर्ट या किसी विशेष अभियोजन न्यायालय के असरदार निर्णय की जरूरत नहीं है कि दिल्ली की यूपीए सरकार भ्रष्टाचार से लथपथ है। वह चंडीगढ़ या लखनऊ में अगली सरकार के लिए वोट दे रहा है, न कि दिल्ली के लिए। जब दिल्ली के लिए मौका आएगा, तो वह उसका जिम्मा लेगा।
जनवरी और फरवरी 2012 में उसे प्रकाश सिंह बादल और मायावती के भाग्य का फैसला करने के लिए कहा गया है। जब टीम अन्ना सरीखे समूह ऐसे ध्येय के लिए अभियान चलाते हैं, जो बेशक बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन इस समय मतदाता की व्यापक चिंताओं के सामने दूसरे दर्जे का है, तो वे मौके की नजाकत को समझने में नाकाम हो सकते हैं। अचंभे की बात है कि पूर्णकालिक नेता भी ऐसी ही गलती करते हैं।
राहुल गांधी यूपी में कैसा करते हैं, इससे इस बारे में कोई ठोस सूत्र नहीं मिलता कि जब वे अंतत: राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का नेतृत्व करेंगे, तो कैसा करेंगे। इस नजरिए से देखा जाए, तो मीडिया की गुड़गुड़ को छोड़कर, कोई फर्क नहीं पड़ता कि छह मार्च को वे जीत की दुदुंभी बजाएंगे या थोड़े हताश होंगे। 2004 में वापस चलें।
राष्ट्रीय चुनाव हारने से पहले, राज्यों में भाजपा की तूती बोली थी। भारत का निर्वाचित नेतृत्वकर्ता होना प्रादेशिक चैंपियन होने से बिल्कुल जुदा बात है। मुझे संदेह है कि डॉ. मनमोहन सिंह पंजाब में मुख्यमंत्री निर्वाचित हो सकते हैं, लेकिन उन्होंने 2009 में प्रधानमंत्री पद के लिए जनादेश प्राप्त किया। सेब और संतरे एक ही स्टॉल पर हो सकते हैं, लेकिन वे एकदम अलग तरह के फल हैं।
पोल, चुनावों का एक छोटा हिस्सा हैं। जब पोल बगैर किसी प्रतिबंध के खबरों का हिस्सा हुआ करते थे, तब सरकारें गिरीं और बनी रहीं। ये तो व्यापक मेनु में मसालों की छौंक की तरह हैं। निर्वाचन आयोग मतदाता के भोजन को कई प्रकार के विषैले पदार्थो से बचाकर बहुत बढ़िया काम कर रहा है, लेकिन यह जरा से पुराने स्वाद को वापस भी तो ला सकता है। - लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।