राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत उत्तर प्रदेश में लगभग 50 अरब रुपए का घोटाला पकड़ा गया, लेकिन अभी तक किसी भी मुख्यमंत्री या मंत्री ने आत्महत्या नहीं की है और न ही उनमें से किसी की हत्या हुई है। कल सुनील वर्मा ने आत्महत्या कर ली। कौन थे ये सुनील वर्मा? ये कोई मंत्री या नेता नहीं थे।
वे उत्तर प्रदेश की जल निगम के अफसर थे। उन्होंने अपने आत्महत्या-पत्र में लिखा है कि उनके घर पर पड़े सीबीआई छापे से वे बहुत व्यथित थे। वे बेकसूर हैं। वे अपनी जान खुद ले रहे हैं। हो सकता है कि जांच के बाद उनका दावा सही निकले, लेकिन कुछ माह पहले जिन तीन वरिष्ठ अफसरों की हत्या हुई, वे तो यह भी नहीं कह सके कि वे बेकसूर हैं।
सुनील वर्मा के मुकाबले उत्तर प्रदेश सरकार के ये तीनों अफसर कहीं ज्यादा खतरनाक सिद्ध हो सकते थे। विनोद आर्य, बीपी सिंह और योगेंद्र सचान शायद वह बात कह सकते थे, जो सुनील वर्मा ने नहीं कही। वे यह बता सकते थे कि असली कसूर किसका है? 50 अरब डकारने वाले नेता कौन-कौन हैं, यह बात वे ही बता सकते थे। इसीलिए इन तीनों अफसरों का नामो-निशान ही मिटा दिया गया।
अब डर के मारे न तो कोई अन्य अफसर और न ही इन मृत अफसरों के परिवार वाले अपना मुंह खोलेंगे। देश के महालेखाकार विनोद राय ने अपनी रपट में यह तो साफ-साफ कह दिया कि केंद्र द्वारा भेजे गए 80 अरब रुपए में से 50 अरब कहां गायब हुए, इसका कोई सुराग नहीं है।
जो सुराग दे सकते थे, उनकी हत्या करवा दी गई। क्या यही सबसे बड़ा सुराग नहीं है? जो इस सुराग को नहीं देख सकते, वे तो अंधों से भी ज्यादा गए-बीते हैं। आप खुद दिमाग लगाएं और बताएं कि वे 50 अरब रुपए किसने खाए होंगे?
50 अरब रुपए के इस धांधले को उजागर हुए लगभग साल भर हो गया, लेकिन अभी तक सरकार और सीबीआई असली अपराधियों को पकड़ नहीं पाई है। उन्हें सजा देना तो बहुत दूर की बात है और 50 अरब की वसूली तो बिल्कुल असंभव ही है।
इस बीच खबरपालिका ने शोर मचाया तो उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने अपने एक मंत्री को बर्खास्त कर दिया और एक ने डर के मारे इस्तीफा दे दिया। यह काफी हो गया। आम लोगों के खून-पसीने की कमाई आप पहले डकार जाएं और फिर पोल खुलने पर इस्तीफा दे दें। बस, मामला आया-गया हो गया।
ज्यादा से ज्यादा यह होता है कि कुछ दिनों तक आप जेल की हवा खा आएं। मुफ्त में सरकार की रोटी तोड़ें। अमानत में खयानत करें और फिर जमानत पर छूट जाएं। छूटकर उस डकैती के पैसे से बड़े-बड़े वकील करें और मुकदमों को बरसों लटकवा दें या पूरी तरह छूट जाएं।
हमारे देश में भ्रष्टाचार की यही कहानी है। इसीलिए कोई नेता आत्महत्या क्यों करे? और कोई भी उसकी हत्या क्यों करे? हत्या तो उसकी की जाती है, जिससे कोई डर हो। क्या नेता को खुद से कोई डर होगा? क्या नेता अपना रहस्य खुद उजागर करेगा? इसीलिए नेता की रक्षा के लिए अफसर का मरना जरूरी है। उन सब लोगों का मरना जरूरी है, जो रहस्योद्घाटन कर सकते हैं।
भारत और पाकिस्तान ही नहीं, दुनिया के कई देशों में बेकसूर पत्रकार क्यों मारे जाते हैं? क्योंकि उनके पास रहस्य होते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में ‘जागते रहो’ की आवाज लगाने वाले अनेक नागरिकों की हत्या क्यों हुई है? अभी तक उनकी हत्या का कोई सुराग क्यों नहीं मिला है? गवाहों की हत्या तो आम बात है। ललित नारायण मिश्र की हत्या का राज आज तक क्यों नहीं खुला? इंदिराजी के शासनकाल में 60 लाख रुपए देने वाला बैंक अधिकारी मल्होत्रा अचानक कैसे मर गया? ए. राजा के नजदीकी सादिक बच्चा ने आत्महत्या क्यों की?
गाजियाबाद के न्यायिक घोटाले के कर्णधार आशुतोष अस्थाना की अचानक मौत कैसे हो गई? उत्तर प्रदेश के भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के मुख्य गवाह शशिकांत राय अचानक मरे हुए क्यों पाए गए? कलकत्ते के रिजवानुर मामले की जांच कर रहे पुलिस अफसर अरिंदम मन्ना की हत्या किसने की? लालू के चारा कांड के सूत्रधार श्यामबिहारी सिन्हा कहां अंतर्धान हो गए? हमारी सरकारें और अदालतें बड़े-बड़े मगरमच्छों पर हाथ नहीं डाल पातीं। छोटी-मोटी मछलियों को ही फंसा लेने में वे गर्व अनुभव करती हैं।
क्या आज तक किसी भी सत्ताधारी भ्रष्टाचारी को पकड़कर, जैसा कि नेहरूजी कहते थे, चांदनी चौक में किसी खंभे से लटकाया गया? यदि लटकाया गया होता तो सारे देश में उसका बिजली का-सा असर होता। खास गवाहों और सूत्रधारों को हत्या और आत्महत्या से बचाने की भी कोई तदबीर हमारे पास अभी तक नहीं है।
सरकार और अदालतें इस पर शीघ्र ध्यान दें। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को स्वायत्त बनाना क्यों जरूरी है, यह अब तो लोगों की समझ में आ जाना चाहिए। अपराध की असली जड़ और ब्यूरो का सीधा संबंध है। ब्यूरो उसी से अपना जीवन-रस ग्रहण करता है। यह जड़ क्या खुद ही को खोद डालेगी? कतई नहीं। इसीलिए हर धांधली में, हर घोटाले में, हर अपराध में शाखाओं और पत्तों को ही कटना पड़ता है। जड़ हमेशा हरी रहेगी। मरना अफसरों को ही पड़ेगा। आखिरकार वे ही फंसेंगे।
ऐसे में अफसर ही कोई सबक क्यों नहीं लेते? वे अपनी जान से क्यों जाते हैं? कोई भी मंत्री या मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री जब धांधली करने को कहे तो वे बगावत का झंडा खड़ा क्यों नहीं कर देते? वे उनका क्या बिगाड़ लेंगे? तबादला कर देंगे, गोपनीय रपट बिगाड़ देंगे, मनपसंद पद नहीं देंगे, कभी-कभी पदोन्नति भी रोक सकते हैं, लेकिन इन सब प्रवंचनाओं के मुकाबले क्या मरना भला है?
अब जागरूक नागरिकों और खबरपालिका के नए पंख उग आए हैं। कोई चीज छिपी नहीं रह पाती। ऐसे में, आखिरकार मरना अफसरों को ही पड़ता है। या तो वे जीते-जी मरते रहते हैं या उन्हें मार दिया जाता है या फिर वे अपनी जान खुद ले लेते हैं। - लेखक प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक हैं।