पीड़ित पुरुष की व्यथा भी तो कोई समझे!
प्रिया आर्य
| Aug 01, 2012, 00:08AM IST

आज सूरज पश्चिम से निकला था। दरअसल मिस्टर परेशान बड़ी मुश्किल से आज समय पर ऑफिस आ पाए। काम का श्रीगणोश करने बैठे ही थे कि उनके मोबाइल की घंटी बजी। चेहरे के हाव-भाव देखकर सहजता से अंदाजा लग गया कि फोन घर से है। भोंपू की तरह चिल्लाने वाले शख्स की आवाज बीवी के फोन पर गले से निकलती ही न हो जैसे। ‘हां, अभी आया हूं, लेकिन.., फिर.., तो.., मगर.., सुनो.., कहां..।’ और फोन कट। सवाल करने का हक उनको कतई नहीं मिला। सिर्फ सुनो और जैसा कहा जाए, वैसा करो। गले का वॉल्यूम धीमा होने के बावजूद आस-पास के लोगों का ध्यान उनकी ही तरफ था। यह देख एक अच्छे कलाकार की तरह झूठी हंसी देते हुए मि. परेशान बोले - ‘पत्नी का फोन था। चिंता कर रही थी। पहुंचकर फोन नहीं किया न।’ बिन मांगे इतनी सफाई दे दी कि साफ समझ आ गया कि हालात ठीक नहीं हैं। हालांकि दफ्तरवालों के लिए ये कोई नई बात नहीं रही थी अब।
इनके जैसे न जाने कितने होंगे, जो ऑफिस बैग में अपने घर की उलझनें भरकर लाते हैं। अब तो उन्हें ऑफिस में भी भीगी बिल्ली बनकर रहना पड़ रहा है, महिला सहकर्मी उत्पीड़न का केस न ठोंक दे। महिला भले ही सज्जनी न हो, मगर सज्जन पुरुष जल्दी ही दुर्जन बन जाता है।
मि. परेशान जैसे कई मि. एक्स, वाई, जेड हैं, जिन्हें अपने कामों से ज्यादा तनाव घर की परेशानियों का है। पत्नी हर दस मिनट में फोन करके कहती है - ऑफिस से लौटते वक्त फलां सामान लेते आना। आज बच्चों की वैन नहीं आई, तुम ऑफिस से थोड़ी देर के लिए उठकर बच्चों को ले आओ। या फिर मेरे सिर में बहुत दर्द है, दवा लेते आना। हालात ऐसे बन जाते हैं कि बेचारे पति के सिर में ही दर्द होने लगता है। शायद इसलिए पुरुषों को हंसाने, बहलाने और दिलासा देने के लिए आजकल चुटकुले पत्नीपीड़ित पति और युवतियों के नखरों से परेशान युवकों पर केंद्रित करके बनाए जा रहे हैं। कुल मिलाकर पुरुष की उलझनें जब समझने वाला कोई नहीं होता, तो एक अच्छा व्यक्ति मदिरा, धूम्रपान जैसी गंदी लत का शिकार होने लगता है क्योंकि ये नशा उन्हें अलग दुनिया में ले जाता है, जहां वे कुछ वक्त के लिए परेशानियों से दूर हो जाते हैं।
जब पुरुषों की जिंदगी में झांका और एक पिता, भाई, पति, ससुर जैसे कई पुरुषप्रधान रिश्ते से जुड़कर देखने की कोशिश की, तो पाया कि हम स्त्रियां तो दुख में रोकर अपने आंसू बहाकर हल्का हो लेती हैं, मगर इन्हें हर स्थिति में परिवार के लिए सख्त शिला बनकर रहना होता है। इन पर जहां आय का स्रोत बनने की जिम्मेदारी होती है, वहीं घर पर समय न दे पाने पर ताने भी भरपूर मिलते हैं। उस पर अगर घर की स्त्री कामकाजी हुई, तो स्वाभिमान को भी बरकरार रखना होता है। मगर सोचिए, कैसा लगता होगा उस पिता को, जो रोज देर रात ऑफिस से लौटता है और उसके बच्चे सोते हुए मिलते हैं। क्या गुजरती होगी उस भाई पर जो बेरोजगारी की मार सहता हुआ आज भी बहन को राखी पर 21 रु. से ज्यादा नहीं दे पाता।
स्त्री में सहनशीलता होती है, भावनाएं होती हैं, मगर तथ्य कहते हैं कि जिंदगी के सबसे ज्यादा अनुभव एक पुरुष के पास ही होते हैं, लेकिन उन अनुभवों को बटोरने के लिए उन्हें गहराई से समझने की जरूरत है, उनसे जंग करने की नहीं।






