कब आएंगे मेहनतकश नन्हे हाथों के दिन?
डॉ. महेश परिमल | May 01, 2012, 00:45AM IST

उनकी सांसों में या तो बारूदी गंध समाई हुई है या फिर महीन रेशे के रूप में मासूम फेफड़ों पर जम रही है। आज मजदूर दिवस पर हमें यह सोचना है कि बाल मजदूर भी मजदूर हैं, इन्हें स्कूल में होना चाहिए, न कि होटलों-कारखानों में।
शायद आपने कभी नहीं सोचा होगा कि शिक्षक को जब भी अपनी कोई बात समझानी होती है, तब वे चॉक का इस्तेमाल करते हैं। दूसरी ओर कभी कहीं भी कोई खुशी का अवसर आता है, तब लोग पटाखे चलाकर अपनी खुशियां जाहिर करते हैं।
दीप पर्व पर तो यह पूरे देश में खुले रूप में दिखाई देता है। पर क्या कभी किसी ने सोचा कि इसके पीछे कई नन्हे हाथों का कमाल है। ये वही नन्हे हाथ हैं, जिनकी आंखों में एक सपना पलता है, कुछ करने का, पढ़ने और आगे बढ़ने का, लेकिन रोटी के संघर्ष में उनकी आंखों में पलने वाले सपने धुंधले हो गए हैं।
छोटी उम्र में ही अपने अभिभावकों को अपने होने की कीमत अदा करते हैं। सरकारी भाषा में इन्हें बाल श्रमिक कहा जाता है। बाल श्रमिक या बाल मजदूर यानी 14 वर्ष से कम आयु के बच्चे, जो अपनी आजीविका चलाने के लिए स्वयं या अपने माता-पिता के साथ काम पर जाते हैं या काम करते हैं।
बाल श्रमिकों के नाम पर चाहे कितनी भी योजनाएं बनें या कितनी भी घोषणाएं हों, लेकिन कुछ हो नहीं पाता। हां, सरकारी आंकड़ों पर निश्चित ही कुछ ऐसा हो जाता है, जिससे लगे कि हमारे देश में बाल श्रमिकों की संख्या में कमी आई है। लेकिन देखा जाए तो हमारे देश में बाल श्रमिकों की संख्या सर्वाधिक है।
भारत के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के अनुसार देश में साढ़े चार करोड़ से लेकर करीब ग्यारह करोड़ के बीच बाल श्रमिक हैं। इस संख्या को देखते हुए शासन द्वारा बाल श्रम को रोकने के लिए जहां कानूनी प्रावधान किए गए हैं, वहीं ऐसे बच्चों की शिक्षा के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराने हेतु ठोस पहल के रूप में बाल श्रमिक शालाओं की भी स्थापना की गई है।
अब यह बहुत कम लोग जानते हैं कि बाल श्रमिकों के लिए प्रारंभ की गई शालाएं कैसी चल रही हैं। जब शिक्षकों की फौज होने के बाद भी सरकारी शालाओं की स्थिति दयनीय है, तो बाल श्रमिकों के लिए स्थापित की गई शालाओं की क्या स्थिति होगी, इसे बताने की जरूरत नहीं है।
होने को तो कई विभागों में एक श्रम विभाग भी है, पर वहां किसी श्रमिक का एक आवेदन कितने वर्षो तक फाइलों में कैद रहता है, इसे भी बताने की आवश्यकता नहीं है। कुछ गैर सरकारी संस्थाओं ने निश्चित ही इस दिशा में कुछ ठोस कार्य किए हैं, पर उनके कार्य ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ के समान हैं।
आखिर कहां खो गई हमारी संवेदनाएं? होटल में बच्चे द्वारा लाया गया पानी का गिलास टूट जाए, तो हम उसे पिटता देखते रहते हैं। ठंडे कमरों में बाल श्रमिक पर गरमा-गरम बहसें होती हैं। सरकार की योजनाएं कहीं थक-हारकर सिमट जाती हैं। इन्हीं मासूम चेहरों में छिपा होता है वह दर्द कि हमारा कसूर केवल इतना ही है कि हम गरीब हैं, हमारे माता-पिता मजदूर हैं, इसलिए हम भी मजदूर हैं। आखिर कब बदलेगी ये तस्वीर?





