कार्यस्थल पर यौन-उत्पीड़न
dainik bhaskar news
| Aug 22, 2012, 00:13AM IST
दरअसल, हजारों कामकाजी महिलाएं लगभग रोज ही अपने बॉस या सीनियर अधिकारी के समक्ष खुद को कमजोर एवं समझौता करने के लिए विवश स्थिति में पाती हैं। सरकारों के रुख का आलम यह है कि 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा मामले में कार्यस्थलों पर यौन-उत्पीड़न रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे, लेकिन अब तक इस बारे में कानून नहीं बना। अब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कार्यस्थलों पर यौन-उत्पीड़न के खिलाफ महिलाओं को संरक्षण देने के लिए एक विधेयक को मंजूरी दी है, लेकिन यह कब संसद से पास होगा, कहना कठिन है।
यह विधेयक काफी समय तक इस विवाद में उलझा रहा कि घरों में काम करने वाली स्त्रियों को इसके दायरे में रखा जाए या नहीं। अच्छी बात है कि अंतत: ऐसी महिलाओं को भी इस कानून का संरक्षण देने का फैसला हुआ है। लेकिन महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने ध्यान दिलाया है कि अभी भी विधेयक में कुछ प्रावधान ऐसे हैं, जिनसे प्रस्तावित कानून का मकसद परास्त हो सकता है। मसलन, आरोपी की पहचान गोपनीय रखने और शिकायत ‘दुर्भावनापूर्ण’ पाए जाने पर पीड़ित महिला के खिलाफ कार्रवाई के प्रावधानों की तरफ ध्यान खींचा गया है।
क्या गीतिका आत्महत्या मामले में गोपाल कांडा की पहचान गोपनीय रखी जानी चाहिए? फिर बॉस एवं कर्मचारी के बीच हैसियत और ताकत का जो फर्क होता है, उसमें शिकायत को दुर्भावनापूर्ण बता दिया जाना कठिन नहीं है। क्या ऐसे में पीड़ित महिलाएं शिकायत के लिए आगे आएंगी? महिला अधिकार संगठनों की तरफ से उठाए गए ये सवाल अहम हैं। इसलिए आवश्यक है कि संसद इन पर बारीकी से विचार करने के बाद ही बिल पर मुहर लगाए।






