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भरोसा क्यों खो रही हैं सरकारें?
प्रीतीश नंदी | Jul 05, 2012, 07:09AM IST

अनेक लोगों को लगता है कि अग्निकांड की यह घटना वास्तव में उन घोटालों के दस्तावेज नष्ट करने की साजिश थी, जिनकी अभी जांच चल रही है। इसमें आदर्श सोसायटी घोटाले का नाम प्रमुख है। इस घोटाले में तीन पूर्व मुख्यमंत्री सीबीआई जांच के दायरे में हैं। कुछ लोगों ने इस तरह की अफवाहों को बढ़ावा दिया कि पुणो के उपनगरीय इलाकों में हुए एक बड़े भूमि घोटाले पर परदा डालने की कोशिश की गई है, जिसमें बिल्डरों को भारी मुनाफा पहुंचाया गया था। कुछ अन्य ने कहा कि आग जान-बूझकर लगाई गई थी, ताकि एक वरिष्ठ मंत्री का वरदहस्त प्राप्त एक ताकतवर बिल्डर द्वारा प्रस्तावित मंत्रालय के नवीनीकरण की योजना को अमल में लाया जा सके। लेकिन यह कॉलम अफवाहों के बारे में नहीं है, यह इस त्रासद सच्चाई के बारे में है कि आज हमारी सरकारें विश्वसनीयता के अभाव के कितने गंभीर संकट से जूझ रही हैं।
अफवाहों के साथ ही यह घटना मजाक का विषय भी बनी। अग्निकांड के जोक्स तो अफवाहों से भी बदतर थे। सबसे पहला जोक तो यही था कि कुछ मंत्रियों ने फायर ब्रिगेड को समझाइश दी कि वे आग बुझाने के लिए पानी के बजाय पेट्रोल का उपयोग करें। मैं इसी तरह के सैकड़ों और जोक्स का यहां उल्लेख कर सकता हूं, लेकिन पॉइंट यह है कि हादसों पर दुख व्यक्त करने के बजाय ब्लैक ह्यूमर का इसलिए इस्तेमाल किया जाने लगा है, क्योंकि अब सरकारों पर कोई भरोसा नहीं करता। लोग अपने इर्द-गिर्द घटित होने वाली हर चीज की व्याख्या निहायत ही सिनिकल या निराशावादी रूप से करते हैं। एक अखबार ने खबर छापी कि आग लगते ही किस तरह कैबिनेट के सबसे वरिष्ठ मंत्रियों में से एक जान बचाकर दौड़े और उन्होंने इस बात की भी फिक्र नहीं की कि उनके स्टाफ के सदस्यों के साथ ही उनके मेहमान और दोस्त भी पीछे छूट गए हैं। इनमें से दो की हादसे में मौत हो गई। लेकिन सबसे बदतर बात थी उपमुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से यह सवाल उठाया जाना कि मुख्यमंत्री के दफ्तर का आगजनी से सुरक्षित बच जाना कितनी विचित्र बात है!
किसी भी सरकार के लिए सबसे बुरी बात यह नहीं होती कि वह अपना चेहरा और अपनी पहचान गंवा दे। उसके लिए सबसे बुरी बात यह होती है कि लोग उस पर भरोसा करना छोड़ दें। जब लोग सरकार पर भरोसा करना बंद कर देते हैं तो उसके अच्छे कार्यो को भी सराहना नहीं मिलती और उसके द्वारा की गई हर गलती को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है। महाराष्ट्र सरकार के साथ भी यही बात है। हालांकि पृथ्वीराज चव्हाण के बारे में जनता के मन में अब भी गलत धारणा नहीं है और इसकी वजह यह है कि वे महाराष्ट्र की स्थानीय राजनीति के बजाय दिल्ली के मार्फत यहां आए हैं। महाराष्ट्र की स्थानीय राजनीति अपराध और भ्रष्टाचार में गले-गले तक डूबी है और घोटालों में मंत्रियों के लिप्त होने की खबरें बद से बदतर होती जा रही हैं।
अग्निकांड की इस घटना से एक बात साफ हो गई है और वह यह कि महाराष्ट्र सरकार को केंद्र सरकार की ही तरह अपने मंत्रिमंडल में उलटफेर कर उसकी मरम्मत करने की सख्त जरूरत है। महाराष्ट्र सरकार में वाकई कुछ मंत्री ऐसे हैं, जिन्हें निकाल बाहर करना जरूरी है। और अगर गठबंधन कारणों (जैसा कि ऐसे मौकों पर अक्सर बहाना बनाया जाता है) से ऐसा कर पाना संभव नहीं है तो इतना तो किया ही जा सकता है कि सरकार की छवि सुधारने की आमूलचूल कोशिशें हों। साथ ही सरकार के मुखिया का भद्र, शालीन और बिल्डर्स के चंगुल से दूर होना भर ही काफी नहीं है। जरूरत इस बात की भी है कि मुख्यमंत्री ऐसा हो, जो मंत्रियों द्वारा सरकारी खजाने की लूटखसोट करने या पुलिस अधिकारियों द्वारा दंभ का खुलेआम प्रदर्शन करने पर चुप न बैठे और जरूरी कार्रवाई करे।
जब किसी राज्य की सरकार अपनी युवाशक्ति को अपना शत्रु मानने लगती है, जब वह नए मीडिया पर पाबंदियां लगाना चाहती है, जब वह सोशल नेटवर्किग साइट्स या बीबीएम पर होने वाली प्राइवेट चैट्स की निगरानी करने लगती है, जब वह युवाओं की सहज खुशी पर रोक-टोक लगाने लगती है, जब वह यह बर्दाश्त नहीं कर सकती कि युवा समुद्र तट पर बैठकर सुकून के दो पल बिताएं, जब वह पार्टी मनाने और ट्रांस संगीत सुनने वाले युवाओं को गिरफ्तार कर लेना चाहती है, जब वह उनके चाल-चलन की निर्णायक बन जाती है तो मुझे डर है कि वह सरकार खुद से ही एक ऐसी लड़ाई लड़ने लगती है, जिसे वह कभी नहीं जीत सकती।
हां, यह जरूर हो सकता है कि सरकार युवाओं को सताए और उन पर पाबंदियां लगाए। वह उन्हें झूठे आरोपों में गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भी धकेल सकती है, वह गुस्सैल और रूढ़िवादी अभिभावकों की भूमिका निभाते हुए युवाओं का नाम बुराई की फेहरिस्त में शामिल कर सकती है, लेकिन तब उसे जवाबी कार्रवाई के लिए भी तैयार रहना चाहिए। उसे युवाओं के आक्रोश का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। युवा राजनीतिक बदलावों के मार्फत अपने गुस्से को अभिव्यक्त करना जानते हैं। दुनिया के अनेक हिस्सों में हो रही घटनाएं इस बात का सबूत हैं कि जब युवाओं का आक्रोश उफनता है तो सरकारों को बदलते देर नहीं लगती।
एक युवा राष्ट्र और आगे बढ़ने को आतुर युवा पीढ़ी को भ्रष्ट और अकार्यक्षम लोगों का समूह थाम नहीं सकता। ज्यादा से ज्यादा वह इतना ही कर सकता है कि उनकी राह थोड़ी देर को रोक ले।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार हैं।






