पटना। सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो बिहार में आर्यभट से जुड़े तीन जगहों का नया अवतार होगा। कहीं दिन में एस्ट्रोलॉजी हो सकती है तो कहीं आकाश में होने वाले बदलावों का अध्ययन करने के लिए नाइट ऑब्जर्वेशन साइट बनाया जा सकता है। इसके लिए एक टीम बनायी गयी है।
जाने-माने एस्ट्रोलॉजर अमिताभ पांडेय ने आर्यभट से जुड़े तरेगना, खगौल और बिहटा का दौरा किया। ये तीनों स्थान पटना के 15 से 40 किलोमीटर के दायरे में है। तीनों स्थानों से गुप्त तथा तथागत के समय के बर्तन के टुकड़े मिले हैं। इससे पता चलता है कि इन स्थानों पर बसावट यानी आबादी थी। राज्य सरकार ने उन्हें इन स्थानों के अध्ययन और उसे विकसित करने की संभावनाओं को तलाशने की जिम्मेदारी दी है। तरेगना ऐसी जगह है जहां से सूर्य ग्रहण को बेहतर तरीके से देखा जा सकता है। तरेगना के नाम से भी ध्वनित होता है कि कोई ऐसी जगह जहां से तारों की गणना होती हो। बाद में उस शब्द का अपभ्रंश होते-होते वह तरेगना बन गया।
पटना के मसौढ़ी में एक टीला है। अनुमान किया जाता है कि इसी टीले से आर्यभट आकाशीय बदलावों का अध्ययन किया करते थे। अमिताभ पांडेय ने भास्कर डॉट कॉम को बताया कि यह टीला अब भी है और यहां आबादी बस गयी है। टीले से बर्तन के टुकड़े मिले हैं। इसी जगह से करीब डेढ़ सौ साल पहले चांदी के सिक्के मिले थे। सूर्य की मूर्ति भी मिली थी। माना जाता है कि आर्यभट नास्तिक थे लेकिन सूर्य के उपासक थे। पांडेय का मानना है कि तरेगना में दिन में एस्ट्रोलॉजी के लिए उसे एक केंद्र के तौर पर विकसित किया जा सकता है। उसी जगह पर म्यूजियम बनाने की संभावनाएं भी देखी जा रही हैं।
दुनिया में आर्यभट पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बताया था कि धरती अपनी धुरी पर घूम रही है। यानी गैलेलियों के एक हजार साल पहले यह बात आर्यभट ने कही थी। गैलेलियों ने यह सिद्धांत दिया था कि धरती सूर्य की परिक्रम करती है। पर आर्यभट धरती के अपने केंद्र पर घूमने की बात तो कही मगर सूर्य के परिक्रम करने का अनुमान नहीं लगा पाये थे। खगोलीय परिवर्तनों के संदर्भ में आर्यभट की गणना यूरोपिय पद्धति की तुलना में बेहद सटीक मानी गयी है। ऐसा अनुमान है कि पटना के निकट खगौल में उनका गुरुकुल चलता था। अब वहां बड़ा से तालाब बन गया और उसकी परिधि में आबादी बस गयी है। आर्यभट से जुड़ी तीसरी जगह बिहटा के लई गांव के समीप सोन नदी के अंदर होने का पता चला है। सोन नदी के अंदर दीवाल है। प्रकारांतर में इस जगह से नदी ने अपना रास्ता बना लिया होगा और दीवाल उसके गर्भ में समा गया।
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