मझधार में भी बच्चे पैदा करने में आगे हैं बिहारी

पटना। बिहार का एक सच यह भी है। जिंदगी की बुनयादी जरूरतें भले कम हो, पर यहां बच्चों को जन्म देने का रेट सबसे अधिक है। कुपोषण, गरीबी रेखा, प्रति व्यक्ति आय और शिक्षा में पीछे रहने वाला बिहार इस मामले में राष्ट्रीय औसत को पीछे छोड़ चुका है।
बिहार में हेल्थ को लेकर जारी एक रिपोर्ट में कई हैरान करने वाली बातें हैं। मसलन यह कि राज्य में 15 से 49 साल की महिलाओं में कुपोषण का रेट बढ़कर 68.2 परसेंट हो गया है। यह 1998 में 60 परसेंट था। इसका अर्थ यह हुआ कि महिलाओं की एक बड़ी तादाद को खाने-पीने की जरूरतें नहीं पूरी हो पा रही हैं। यह तस्वीर बताती है कि महिलाओं के लिए चलने वाली योजनाएं उन तक ठीक-ठाक नहीं पहुंच रही हैं।
इसके ठीक उलट देखें तो यहां बच्च पैदा करने का रेट राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। इसका राष्ट्रीय औसत 2.58 है तो बिहार में यह 3.7 है। इसका मतलब है कि राज्य की एक महिला तीन से ज्यादा बच्चों को जन्म देती हैं। इस मामले में राज्य के अररिया, कटिहार, खगड़िया, किशनगंज, मधेपुरा, सहरसा, शेखपुरा, पूर्वी व पश्चिमी चंपारण और शिवहर की महिलाएं दूसरे जिलों से आगे हैं। इन जिलों में महिलाएं चार से ज्यादा बच्चों को जन्म देती हैं।
एक खास कम्युनिटी में ज्यादा बच्चे होने का नजरिया बिहार के इन जिलों मे आकर खंडित हो जाता है। किशनगंज में अगर अल्पंख्यक आबादी ज्यादा है और वहां ज्यादा बच्चे पैदा हो रहे हैं तो मधेपुरा व सहरसा में ऐसा नहीं होना चाहिए था। किशनगंज में फर्टिलिटी रेट जहां 4.5 है वहीं मधेपुरा में 4.1 और सहरसा में 4.5 है। मधेपुरा और सहरसा अल्पसंख्यक बहुल इलाके नहीं हैं।
एजुकेशन के साथ रिश्ता
शिक्षा के साथ बच्च पैदा करने के बीच कोई संबंध है? डेटा ऐसा ही कुछ कहते हैं। किशनगंज में साक्षरता दर 31.1 परसेंट है तो महिला साक्षरता 18.49 परसेंट है। मधेपुरा में यह 36.19 और महिला साक्षरता दर 22.31 परसेंट है। सहरसा में कुल साक्षरता दर 39.28 है तो लड़कियों में साक्षरता दर 25.31 है। पटना में फर्टिलिटी रेट 2.8 है तो यहां साक्षरता दर 63.82 और लड़कियों में यह 52.17 है।
गरीबी व अशिक्षा वजह
पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में प्रोफेसर डॉ राजीव कुमार सिंह कहते हैं कि यह गरीबी व अशिक्षा की वजह से है। सोचने का पुराना तरीका भी ज्यादा बच्चे होने का कारक है। इसका हल सरकार के अलावा सामाजिक स्तर पर चौतरफा पहल शुरू करने से निकलेगा। हेल्थ सर्विस के लोगों तक नहीं पहुंच को बढ़ाना चुनौती है।







