रांची/पटना। बिहार से झारखंड के अलग हुए 12 वर्ष हो गए, पर यह बदनसीबी ही है कि झारखंड का ‘इतिहास’ आज भी बिहार में गिरवी पड़ा है। राज्य बनने के पूर्व समय-समय पर हुई खुदाई में जो भी पुरावशेष, मूर्तियां, पांडुलिपियां झारखंड क्षेत्र में मिली थीं, वे आज भी बिहार के किसी न किसी संग्रहालय में धूल फांक रही हैं। यदि उनको झारखंड लाया जाता और विधिवत अध्ययन होता, तो झारखंड के इतिहास के संबंध में विस्तृत जानकारी हासिल हो सकती थी। लेकिन इन 12 सालों में न तो झारखंड की सरकार ने अपनी धरोहरों को यहां लाने की कोशिश की, न बिहार ने ही कोई पहल की।
कई संग्रहालयों में बिखरी पड़ी हैं धरोहर
राज्य बनने के पूर्व झारखंड के विभिन्न जिलों में समय-समय पर मिलने वाली पुरातात्विक महत्व की सामग्री को पटना भेज दिया जाता था। इनमें से कुछ वस्तुएं पटना संग्रहालय में रखी गई हैं। कुछ कोलकाता और भुवनेश्वर संग्रहालय में हैं। राज्य बनने के बाद पटना, भुवनेश्वर और कोलकाता से इन धरोहरों को वापस लाया जाना चाहिए था, लेकिन उच्चस्तरीय प्रयास के अभाव में अबतक यह संभव नहीं हो पाया है।
कई मूर्तियों पर खुदे हैं अभिलेख
धनबाद और मानभूम के अलुआरा से मिली 29 कांस्य मूर्तियों को पटना संग्रहालय में रखा गया है। वर्ष 1921 में मिली इन मूर्तियों में से अधिकांशत: जैन धर्म से संबंधित हैं। इनमें से कई मूर्तियों पर प्रोटो-बंगला लिपि में अभिलेख खुदे हुए हैं। इस तरह के अभिलेखों में सामान्य तौर पर तत्कालीन समाज व सभ्यता के बारे में वर्णन पाया जाता है। यदि इन अभिलेखों का उचित अध्ययन होता, तो इससे झारखंड के इतिहास पर रोशनी पड़ सकती थी।