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आखिर क्यों नहीं मिल पा रहा है बिहार को विशेष राज्य का दर्जा?

अजय कुमार | Dec 08, 2012, 11:55AM IST
 
 


पटना। तुम्ही से शुरू। तुम्ही से खतम। इसी तर्ज पर बिहार को विशेष दर्जे को लेकर राजनीति पूरे साल चलती रही। पक्ष और विपक्ष इस मुद्दे पर एक-दूसरे के खिलाफ बरसते रहे। तीसरा कोण केंद्र का बना। प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के खिलाफ जदयू के तीर छुटते रहे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उलाहना देते हैं: बिहार के विशेष राज्य के मुद्दे पर बात करने के लिए प्रधानमंत्री जी के पास वक्त नहीं है। वह इसे छोड़कर दूसरे मुद्दे पर समय देते हैं। पर पता नहीं क्यों इस मुद्दे पर बात करने के लिए हमने टाइम मांगा जो आज तक नहीं मिला।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार को विशेष दर्जे की मांग को केंद्र में ला दिया। वे इसे बिहार की प्रगति के लिए जरूरी बताते रहे तो लालू प्रसाद इसे राजनीतिक शिगूफा करार देते रहे। जदयू की ओर से इस मुद्दे पर हस्ताक्षर अभियान चला और सवा करोड़ लोगों के हस्ताक्षर वाला मेमोरेंडम दिल्ली पहुंचाया गया। विरोधी कहते: जब बिहार इतनी तेजी से विकास कर रहा है तो विशेष राज्य की जरूरत क्यों पड़ गयी? सत्तापक्ष की ओर से जवाब मिलता: अपने संसाधनों के बल पर हम यहां तक पहुंचे। अब आगे बढ़ने के वास्ते यह दर्जा जरूरी है। मुख्यमंत्री कहते: मौजूदा विकास दर बनी रहे तो अगले 25 साल में हम राष्ट्रीय औसत तक पहुंचेंगे। अगर विशेष राज्य का दर्जा मिल जाये तो हम तेजी से आगे निकल सकेंगे। इस साल विशेष राज्य का दर्जा और केंद्र सरकार का बिहारके प्रति भेदभाव राजनैतिक रूप से प्रखर मुद्दे रहे।

इस साल मार्च में केंद्र सरकार ने बिहार की इस मांग पर विचार करने के लिए अंतर मंत्रालीय समूह बना दिया। लेकिन उसके नतीजे पहले से ही पता थे। आखिरकार हुआ भी वहीं, समूह ने यह मांग ठुकरा दी। तब नीतीश कुमार ने कहा कि किसी राज्य को विशेष दर्जा देने के बारे में तय पैमाना बदलने की जरूरत है। उधर, 12 मई को पटना आये केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने दो टूक शब्दों में ऐलान कर दिया: बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिलेगा। इसके बाद तो इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गयी। यह सिलसिला बयानों से निकलकर चिट्ठी-पतरी तक पहुंच गया। 16 जून को नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी। उन्हें बताया कि बिहार को स्पेशल स्टेटस क्यों मिलना चाहिए।

जून से बारिश का मौसम शुरू हुआ और इस मुद्दे पर बयानों के दौर भी थोड़े कम हो गये। 19 सितंबर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अधिकार यात्रा शुरू की। इसका मकसद लोगों को केंद्र का बिहार के प्रति रवैये की जानकारी देना और विशेष दर्जे के औचित्य के बारे में बताना था। जिलों में उनकी यात्राएं शुरू हुईं। लेकिन अनेक जगहों पर उन्हें विरोध का भी सामना करना पड़ा। नियोजित शिक्षकों ने उन्हें जहां मौका मिला, वहां घेरा। बहरहाल, चार नवंबर को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में अधिकार रैली रखी गयी। रैली में नीतीश कुमार ने ऐलान किया कि हमारी मांगों पर गौर नहीं किया जाता है, तो हम अगले साल मार्च में दिल्ली के रामलीला मैदान को भर देंगे। केंद्र बिहार की हकमारी कर रहा है। अब इसे हम नहीं सहेंगे।

नीतीश कुमार के इस मूव से जाहिर है कि यह मुद्दा 2014 में होने वाले लोकसभा और उसके अगले साल विधानसभा के चुनाव में सत्ता पक्ष की ओर से प्रभावी बनाकर रखा जाएगा। नीतीश कुमार ने सभी पिछड़े राज्यों के मुख्यमंत्रियों से इस मसले पर बात करने और एकजुट होकर केंद्र पर दबाव बनाने की पहल भी की है। यही नहीं, वह इस मुद्दे को बिहार और आम बिहारियों की तरक्की से जुड़ा बताते हैं। इसे मुद्दे के पीछे की राजनीति और उसका परिणाम चाहे जो हो, शायद पहली बार बिहारियों को बिहार के मुद्दे पर गोलबंद करने की कोशिश हुई है। अगर इसके जरिये राजनीति की भट्ठी में जातीय समीकरण और उसकी विडंबनाएं टूटती हैं, तो वह सकारात्मक ही माना जाएगा। पर लाख टके का सवाल है: बिहार अपनी विडंबनाओं से कैसे बाहर निकलेगा?

 

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