पटना। सोनपुर के पशु मेला में गाय नहीं है। भैंस और हाथी भी नहीं है। एक ऊंट आया है तीन बरस का। वह भी सिर्फ दिखाने के लिए। न हाथी है न महावत। असम और बंगाल के ग्राहकों ने यहां आना छोड़ दिया है। थिएटरों की तादाद बढ़कर नौ हो गयी है। उसमें बिपाशा हैं और कैटरीना भी। ऐश्चर्या और प्रियंका भी हैं। शराब की दुकानों पर दिन निकलते ही बीयर लेने वाले स्कूल-कॉलेज के लड़के जमा होने लगते हैं। स्पेन और इंग्लैंड से कुछ गोरे लोग आये हैं। वे मेले की मस्ती में डूबे हैं। यह मेला का अंतरविरोध है।
एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला हुआ करता था यह। महीने भर रेलमपेल रहती थी। पर अब नहीं है क्योंकि यह मेला पशुओं का रहा नहीं। आयसर, प्रीत ट्रैक्टर के स्टॉल लगे हैं। गोरा बनाने वाला क्रीम गांव की लड़कियों को लुभा रहा है। कश्मीर से कपड़े वाले भी पहुंचे हैं। गुड की मिठाई बेचने वाले झक मार रहे हैं। जलेबी और पकौड़ियों के स्टॉल पर विदेशी मेमों को देसी महिलाएं कनखी से देखती हैं। स्पेन से आयीं अनिटा छन रही जलेबी देख मानों उछल पड़ती हैं: वाउ . . . इट इज फैंटास्टिक। पिंजरा सहित 300 में सुग्गा बिक रहा है। प्लास्टिक का सुग्गा दस में जोड़ा।
पटना से 30 किलामीटर दूर है सोनपुर। सोनपुर है तो सारण जिले का हिस्सा पर वाया हाजीपुर ही वहां पहुंचा जा सकता है। मेला जहां लगता है, उसके ठीक बगल से गंडक नदी गुजरती है। इसे हरिहर क्षेत्र मेला भी कहा जाता है। कार्तिक पूर्णिमा से मेले की शुरुआत होती है। मेले का उल्लेख पौराणिक कथाओं में मिलता है।
बदलाव के साथ मेले को बदलने की कोशिश हुई। मगर उसकी आत्मा कहीं खो गयी लगती है। किसी से भी बात कर लीजिए, वह बताएगा: साहब अब पहले वाली बात कहां। सरकार ने कानून ऐसा बना दिया कि मेला बिना काम का रह गया। जानवरों की खरीद-बिक्री और गायों को दूसरे राज्य से ले आने या उसे भेजने पर रोक क्या लगी, मेले की रौनक जाती रही।
आगे की तस्वीरों में जानें इस मेले और यहां थिएटरों में होने वाले डांस के साथ अन्य बातों के बारे में...