BHASKAR IMPACT: बच्चेदानी घोटाले में राहत देने से हाईकोर्ट का इंकार

पटना। बिहार में बच्चेदानी घोटाले के सिलसिले में एक दर्जन क्लिनिकों को किसी तरह की राहत देने से पटना हाईकोर्ट ने मना कर दिया। अदालत ने कहा कि डॉक्टरों और क्लिनिकों को पहले जिला प्रशासन की ओर से जारी नोटिस का जवाब देना चाहिए।
यह मामला समस्तीपुर से जुड़ा है। वहां के डीएम कुंदन कुमार ने एक दर्जन क्लिनिकों को नोटिस देकर पूछा है कि क्यों नहीं उनका लाइसेंस रद्द कर दिया जाये। इस नोटिस के खिलाफ गुहार लेकर डॉक्टर हाईकोर्ट पहुंचे हुए थे। इन क्लिनिकों की ओर से अदालत को बताया गया कि इस मामले में डीएम एकतरफा कार्रवाई कर रहे हैं। वह दूसरे पक्ष की दलीलों को तवज्जो नहीं दे रहे हैं। आवेदन डॉ महेश कुमार ठाकुर की ओर से कोर्ट को बताया गया कि बच्चेदानी निकालने की शिकायतों का वेरिफिकेशन ही ठीक से नहीं हुआ है। ऐसे में निजी क्लिनिकों पर तोहमत लगाना ठीक नहीं है।
इस मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस वीएन सिन्हा ने आवेदकों को कोई राहत देने से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि जिला प्रशासन की नोटिस का जवाब संबंधित पक्षों को देना चाहिए। दूसरी बात यह कि इस संबंध में जिला प्रशासन ने कोई एक्शन भी नहीं उठाया है। अदालत ने इस आवेदन को प्री मैच्योर करार दिया।
मालूम हो कि बिहार में राष्ट्रीय बीमा योजना के तहत बीपीएल परिवारों के इलाज पर वर्ष 2008-09 से अब तक 332 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इस योजना में व्यापक अनियमितता तब सामने आयी जब समस्तीपुर में सैकड़ों महिलाओं की बच्चेदानी का फर्जी आपरेशन कर दिया गया। एक अनुमान के अनुसार इस योजना के लागू होने के बाद से अब 50 हजार से अधिक महिलाओं की बच्चेदानी का ऑपरेशन किया गया। बच्चेदानी के एक ऑपरेशन के एवज में हेल्थ सेंटर को दस हजार रुपये का भुगतान बीमा एजेंसी के जरिये होता है। राज्य बीपीएल के लिए 78 लाख हेल्थ कार्ड जारी किये गये हैं। समस्तीपुर में हुई अनियमितताओं की आधिकारिक रिपोर्ट सबसे पहले भास्कर डॉट कॉम ने छापी थी।








