यकीं नहीं होगा, लेकिन सच है: 1 दिन चली रेल, फिर 102 सालों से है इंतजार

सहरसा। बिहार के भीमनगर-प्रतापगंज के बीच 9 अगस्त 1910 को पहली बार दौड़ी थी छुक-छुक रेलगाड़ी। इस ट्रैक पर रेलगाड़ी की यह आखिरी दौड़ भी थी। 10 अगस्त को कोसी नदी में आई भीषण बाढ़ का कहर भीमनगर -प्रतापगंज वाया दीनबंधी रेललाइन पर टूटा था। पानी तो उतर गया, लेकिन बाढ़ के बाद पटरियां रेत में समा गईं। तब से लोग इंतजार कर रहे हैं, लेकिन यहां दूसरी रेलगाड़ी आज तक नहीं दौड़ सकी। कई चश्मदीद गवाह अब भी क्षेत्र में हैं।
चैनपुर के हरिमोहन मंडल कहते हैं कि उस त्रासदी के बाद कोसी मैया ने तो कभी इधर का रुख नहीं किया। पर सरकारों ने भी अपना मुंह फेर लिया। 102 सालों बाद भी कोई ट्रेन दौड़ाने नहीं आया। बीते सौ सालों से इस इलाके के लोग इस इंतजार में लड़ाई लड़ते रहे कि कभी न कभी तो यह रेल लाइन बनेगी और दोबारा वे ट्रेन की सवारी कर पाएंगे। तीन पीढ़ियों की लड़ाई रेल लाइन शुरू नहीं करवा पाईं।
1996 में तत्कालीन सांसद दिनेशचंद्र यादव ने पहल की थी। रेल मंत्रालय ने सर्वे के लिए पांच लाख रुपए आवंटित कर दिए थे। तब लालू प्रसाद रेल मंत्री थे। पर जैसे ही लालू पद से हटे सर्वेक्षण का आदेश भी कहीं गुम हो गया।
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