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भास्कर एक्सक्लूसिव: बदलते बिहार में चलती है भीख मांगने की पाठशाला

Satya Prakash | May 01, 2012, 00:50AM IST
 
 


कटिहार. बिहार के कटिहार जिले का बरारी प्रखंड। यहां के भैंस दियारा में सरकार कोई स्कूल नहीं खोल पाई है। लेकिन एक बुजुर्ग भिखारी ने गरीब बच्चों को भीख मांगने की ट्रेनिंग देने के लिए एक पाठशाला जरूर खोल दी है। नाम दिया है, भीख की सीख। दुनियाभर में नालंदा, विक्रमशिला जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों के लिए विख्यात बिहार में यह पाठशाला कैसे खुल गई, इसका प्रशासन के पास कोई ठोस जवाब नहीं है। बस इससे इनकार कर रहे हैं।
 
भीख की पाठशाला से लाइव
 
सुबह क्लास
 
सुबह के आठ बजे हैं। गांव के बाहरी हिस्से में अचानक हलचल बढ़ जाती है। नन्हे-नन्हे कदम भीख की सीख पाठशाला की ओर बढ़ रहे हैं। चलते-चलते भीख मांगने की प्रैक्टिस भी। गलत करने पर एक दूसरे को झिड़कते भी हैं। थोड़ी ही देर में झोपड़ीनुमा पाठशाला में 25 से 30 बच्चे जमा हो जाते हैं। इनमें लड़के-लड़कियां दोनों हैं। उम्र महज 10 से 12 साल। शोर शुरू हो जाता है। अल्लाह के नाम पर दे दे बाबा। भगवान के नाम पर दे दे माई। मैं अनाथ हूं। दो दिनों से कुछ भी नहीं खाया है। आपके बच्चे पढ़ लिखकर बड़े अफसर बनेंगे। तेरा कल्याण होगा।

 

 

इसी शोर शराबे के बीच लाठी की ठक-ठक की आवाज आती है। 70 साल का एक बजुर्ग मोहम्मद महबूब आलम क्लास में आता है। सिर पर लंबे-लंबे सफेद बाल। मुंह पर दाढ़ी। अचानक वहां सन्नाटा पसर जाता है। सभी बच्चे अदब से खड़े हो जाते हैं। इशारा पाकर सभी बैठ जाते हैं। फिर शुरू होती है भीख की सीख। पहले ट्रेनर बताता है कि कैसे भीख मांगनी है। बच्चे उसे दोहराते हैं। ऐसे ही एक घंटे की क्लास खत्म हो जाती है।
 
दोपहर से प्रैक्टिकल
 
क्लास खत्म होने के बाद ये बच्चे भीख मांगने के लिए रेलवे प्लेटफार्म, ट्रेन, बाजार, बसों में पहुंच जाते हैं। लोगों के हाथ-पांव पकड़कर एक-एक रुपए के लिए घिघयाते हैं। कोई झिड़क देता है तो कोई दया दिखाकर कुछ पैसे फेंक देता है। गालियां भी मिलती हैं। यह सिलसिला शाम तक चलता है। एक बार फिर ये सभी बच्चे गांव में जमा होते हैं। चर्चा शुरू होती है, किसे कितनी कमाई हुई। जिसने 100 से ज्यादा कमाए वो सफल। जो कम रहा, उसकी खिल्ली। इसके बाद ट्रेनर उनकी कमाई का कुछ हिस्सा लेकर उन्हें घरों को रवाना कर देता है।
 
स्कूल नहीं हैं, क्या करें
 
बच्चे कहते हैं कि प्रतिदिन 100 से 150 रुपए की कमाई होती है। उनका भी पढऩे का मन करता है। लेकिन गांव में स्कूल नहीं होने से सपने, सपने ही रह गए।
 
भीख ही किस्मत
 
ट्रेनर मो. महबूब आलम बताते है कि गांव में स्कूल, सड़क, पानी, स्वास्थ्य, बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। बच्चे भीख नहीं मांगेगें तो खाएंगे क्या? मां-बाप मजबूर हैं।
 
जांच करेंगे बीडीओ
 
बरारी विधानसभा क्षेत्र के विधायक विभाष चन्द्र चौधरी ने ऐसी पाठशाला होने से इनकार किया। उन्होंने बीडीओ से इसकी जांच करवाने का दावा भी किया।
 

 

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