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एक बार फिर आया फिल्म स्क्रिप्ट का जमाना: संजय चौहान

dainikbhaskar.com | Sep 08, 2012, 17:26PM IST
 
 

संजय चौहान ने आपको 'आई एम कलाम' और 'पान सिंह तोमर' जैसी बेजोड़ फिल्में दीं। संजय बताते हैं कि ऐसी फिल्मों को मंजूरी देने से पहले फिल्म मेकर्स सौ बार सोचते हैं। पेश है, dainikbhaskar.com के साथ हुई उनकी खास बातचीत के कुछ अंश...

'पान सिंह तोमर' साफ तौर से एक यूनीक प्रोजेक्ट थी क्योंकि यह एक ऐसे सैनिक की कहानी थी जो बाद में डकैत बन जाता है, जाहिर है लोग ऐसे मामलों से परिचित नहीं थे। क्या इसके लिए स्क्रीन राइटिंग करने से पहले आपके मन में किसी तरह की आशंका थी?

स्क्रीन राइटिंग ही नहीं दुनिया की कोई भी जॉब जब कोई करने चलता है तो उसके मन में साफ विचार होता है कि उसे ये करना है या नहीं। मुझे शुरू से ही मेरी रूचि और झुकाव के बारे में पता था, मैंने परिणाम के बारे में कभी नहीं सोचा। 'इसका क्या होगा?', 'ये फिल्म बनेगी या नहीं?', 'ये चलेगी या नहीं?' जैसी बातें मेरे जहन में नहीं आतीं क्योंकि मैं इन पर ध्यान नहीं देता। फिल्मों का भाग्य हमेशा अस्पष्ट होता है। मैं जानता हूं कि मेरी इस विषय में दिलचस्पी है और यही मुझे अपना बेस्ट देने के लिए प्रोत्साहित करता है। मेरी जिंदगी में आशंकाओं के लिए कोई जगह नहीं है। जब मैं 'आई एम कलाम' पर काम करना शुरू किया, पांडा और मैंने सोचा था कि हम फिल्म 30-40 लाख में बना लेंगे। हम यही सोचते थे कि, "ऐसी फिल्म बनाते हैं जिसको देख के हमें शर्म न आए।" मुझे इस बात की खुशी है कि फिल्म ने उतना कुछ कर दिखाया जितनी इससे अपेक्षा भी नहीं थी।"

जब मैंने 'पान सिंह तोमर' स्टार्ट की हालात अलग थे। पहले दो साल तो मैंने इस टॉपिक पर जमकर रिसर्च की। चूंकि इंटरनेट पर तोमर से संबंधित कोई खबर नहीं थी इसलिए मुझे स्पोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया की ओर रुख करना पड़ा। मेरे लिए आश्चर्य की बात तो यह थी कि, वे भी तोमर के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। मुझे याद है जिससे भी मैं पूछता, वो यही बोलता, "कौन पान सिंह तोमर"। जब मैं ऑर्मी ऑफिसर्स के पास पहुंचा वे भी उनके बारे में चर्चा करने में सहज नहीं थे। होता भी कौन? बाद में वे डकैत जो बन गए थे। इसी वजह से मुझे उनके बारे में जानकारियां इकट्ठा करने में दो साल लग गए, और इसके लिए मुझे स्थानीय लोगों की मदद लेनी पड़ी। मैंने मुंबई से दिल्ली, ग्वालियर और चंबल कि कई यात्राएं कीं। हर बार मुझे उम्मीद होती थी कि कुछ नई जानकारी मिलेगी। दो साल तक घूमने के बाद, एक साल लगे स्क्रिप्ट को फाइनल करने में और उसके बाद शुरू हुई शूटिंग। हम चाहते थे कि फिल्म कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान रिलीज हो, लेकिन ऐसा हो नहीं सका।

और यह जल्द ही युवाओं में हिट हो गई...

हां, ये सच है। यह सब हुआ बुंदेली शब्दावली के चलते जिसने युथ पर जबरदस्त प्रभाव छोड़ा। मुझे इसे हटाने के लिए बोला गया था क्योंकि लोगों को लगता था कि यह लोगों को समझ नहीं आएगी। लेकिन, मैंने इसके इस्तेमाल पर जोर दिया, और इसने कमाल कर दिखाया। हमने देखा कि यंगस्टर्स जब सिनेमा हॉल्स से निकले तो उसी भाषा में बात कर रहे थे। तब हमें एहसास हुआ कि यहां के लोग भी अब ऐसी फिल्मों के लिए तैयार हो चुके हैं।

हमने इंडियन सिनेमा में जो बदलाव देखे क्या वे यूनीक कॉन्सेप्ट और कभी न सुनी जाने वाली स्क्रिप्ट की देन हैं?

जी हां, हर फिल्म- 'आई एम कलाम', 'साहेब, बीवी और गैंगेस्टर', 'पान सिंह तोमर', 'विक्की डोनर'- सबने इसमें एक अहम भूमिका निभाई है। चूंकि ये फिल्में हिट हुईं इसलिए फिल्ममेकर्स अपनी स्क्रिप्टस के साथ एक्सपेरीमेंट कर रहे हैं। 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' लोगों को पसंद आई क्योंकि इस फिल्म से जैसी अपेक्षा थी इसने वैसा ही किया। दिलचस्प बात यह है कि, 'एक था टाइगर' और 'राउडी राठौर' जैसी फिल्म भी उतनी ही पॉपुलर हुईं जितनी की 'गैंग्स ऑफ वासेपुर', 'पान सिंह तोमर' और 'विक्की डोनर'।
 
 
 

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