चमत्कारी भभूत ने एक शिष्य को बना दिया 'उद्योगपति'
Source: Bhaskar News | Last Updated 03:34(09/02/12)
गुरु प्रभा मंडल सिद्ध पुरुष थे। वे व्यापार प्रबंधन की शिक्षा देते थे। उनका यश दूर-दूर तक फैला हुआ था। बहुत से विद्यार्थी उनके शिष्य बनना चाहते थे। परंतु उनकी परीक्षा बड़ी कठिन होती थी।
उसमें बहुत कम विद्यार्थी सफल हो पाते थे। जो सफल होते, वही उनके शिष्य बन पाते थे। एक दिन एक कुशाग्र बुद्धि का पन्द्रह वर्षीय बालक रोहण उनके पास आया। उसने उनसे शिष्य बना लेने की प्रार्थना की।
प्रभा मंडल ने हवन कुंड से मुट्ठी भर राख निकाली और उसे रोहण को देकर कहा, ‘जाओ, पहले इस राख से दस हजार रुपए कमाकर लाओ, तब तुम्हें अपना शिष्य बनाऊंगा। पर याद रखना, रुपए किसी से भीख मांगकर या कहीं से चोरी करके नहीं लाना है, बल्कि कमाकर लाना है।’
रोहण ने सिर झुकाकर कहा, ‘गुरुजी, मैं आज शाम तक रुपए कमाकर ले आऊंगा।’ इतना कहकर वह रुपए कमाने निकल पड़ा। उस दिन नर्मदा नदी के किनारे ओंकारेश्वर में श्रावणी पूर्णिमा का मेला लगा था। मेले में हजारों लोग थे। रोहण ने प्रभा मंडल द्वारा दी गई राख की छोटी-छोटी दो सौ पुड़िया बनाईं।
दुकानों की पंक्ति में एक स्थान पर कपड़ा बिछाया और उस पर पुड़िया रख दीं। फिर वहीं कागज का बड़ा बोर्ड लगाकर उस पर लिख दिया, ‘गुरु प्रभा मंडल की रोग-दुखीहारी विश्वासी भभूत। प्रति पुड़िया पचास रुपए’। लोग कौतुहलवश वहां खड़े होने लगे।
गुरु प्रभा मंडल पर लोगों की बड़ी श्रद्धा थी। रोग और दुखों से निजात पाने के लिए लोग भभूत खरीदने लगे। रोहण को कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी। कुछ ही देर में भभूत की सभी पुड़िया बिक गईं। रोहण ने रुपए संभाले और आश्रम में लौट आया। उसने राख की कमाई प्रभा मंडल के चरणों में रख दी।
उसने उस युक्ति को अपने गुरु से भी बताया, जिससे वह दस हजार रुपए कमाने में सफल हुआ था। प्रभा मंडल उसकी चतुराई से प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे गले लगाया और अपना शिष्य बना लिया। आगे जाकर यही बालक रोहण देश का प्रसिद्ध उद्योगपति बना।