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भिलाई में १७ यूनियन सक्रिय पर कर्मियों का हित ताक पर ही
Matrix News
| Aug 08, 2012, 02:05AM IST
कर्मचारियों की तार-तार होती उम्मीदों के बीच भिलाई इस्पात संयंत्र में एक और नई यूनियन का उदय हो गया है। यह सत्रहवीं यूनियन है। कर्मियों की अपेक्षाएं पूरी हो न हो श्रमिक राजनीति से जुड़े लोग अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने में जरूर लगे हैं।
एक दौर था जब भिलाई में संगठित क्षेत्र में एशिया का सबसे बड़ा श्रमिक संगठन स्टील वर्कर्स यूनियन ((इंटक)) हुआ करता था। इस यूनियन के साए में भिलाई इस्पात संयंत्र के 40 हजार से भी अधिक कर्मचारी अपने को महफूज महसूस करते थे। कभी बेहद शक्तिशाली रही यह यूनियन अब टुकड़ों में बंट चुकी है। 1996 में विवाद शुरू हुआ जो 16 साल बाद भी जारी है। चरमराती यूनियन को संगठित करने के बजाए इनसे जुड़े लोग अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नए-नए संगठन बनाते रहे हैं।
गौर करने की बात तो यह है कि भिलाई में यूनियन की संख्या बढऩे के बाद भी कर्मियों की समस्याओं व शिकायतों का निपटारा नहीं हो रहा है। प्रबंधन उन्हें न तो मान्यता दे रहा है और न तव'जो। कर्मियों को भी उन पर कोई भरोसा नहीं। यूनियन नेताओं की हांक पर अब सैंकड़ा भर लोग भी जमा नहीं होते। नुक्कड़ पर यूनियन नेता नारेबाजी करते रहते हैं और कर्मचारी मुंह फेरकर बगल से निकल जाते हैं। अभी जो नई यूनियन बनी है वह दिवंगत रवि आर्या के कट्टर समर्थकों का है। यहां आर्या और यूनियन एक-दूसरे के पूरक थे। विचारधारा को लेकर गठित इस नई यूनियन से कर्मियों को काफी उम्मीदें हैं।
तो 'वाइंट कमेटी क्यों नहीं बनाते
राउरकेला इस्पात संयंत्र में प्रतिनिधि यूनियन के चुनाव में किसी भी श्रमिक संगठन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। इससे वहां के श्रमिक नेताओं ने मिलकर 'वाइंट कमेटी बना ली। सेंट्रल की एनजेसीएस कमेटी की तर्ज पर इंटक, सीटू, एटक व एचएमएस के तीन-तीन व अन्य यूनियन के दो-दो प्रतिनिधि कमेटी में शामिल किए गए हैं। वहां के प्रबंधन ने 'वाइंट कमेटी को मान्यता भी दे दी। भिलाई इस्पात संयंत्र में भी मान्यता प्राप्त यूनियन को लेकर शून्य की स्थिति है। कर्मियों का कहना है कि राउरकेला में 'वाइंट कमेटी हो सकती है तो यहां क्यों नहीं?
इस तरह की पहल क्यों नहीं
तीन-चार साल पहले तत्कालीन जीएम पर्सनल आरके नरूला जब यहां आए थे उन्होंने सभी श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों की संयुक्त बैठक बुलाई थी। इसमें केंटीन भत्ता बढ़ाने और बिजली दर में सबसिडी के संदर्भ में चर्चा हुई थी। कर्मचारियों ने प्रबंधन के इस पहल की सराहना भी की थी। इसके बाद न तो प्रबंधन ने सुध लिया और न ही यूनियन नेताओं ने।








