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छत्तीसगढ़ के ‘मॉरीशस आइलैंड’ से अंजान हैं पर्यटक

 
Source: अनुपम सिंह   |   Last Updated 03:17(05/01/12)
 
 
 
 

बिलासपुर।छत्तीसगढ़ के मुख्य बांधों में एक बांगो के बीच अब भी पर्यटकों से लगभग अछूता एक ऐसा स्थान है जिसे बनावट के लिए मॉरीशस का नाम दिया गया है। हसदेव और चोरनई नदी के संगम में बसे इस पर्यटन स्थल पर लोगों की भीड़ अब बढ़ने लगी है।
 
 
नए साल में घूमने के लिए पर्यटन स्थल की तलाश कर रहे लोगों के लिए अच्छी खबर है। बिलासपुर-अंबिकापुर मार्ग में केंदई गांव से महज 10 किमी दूर ऐसी जगह है, जो अपनी बनावट के छत्तीसगढ़ के मारीशस के नाम से प्रसिद्ध हो रही है। बांध के बीचों-बीच पहाड़ियों पर ऐसी जगह है जहां अब भी प्रकृति को पूरी खूबसूरती के साथ देखा जा सकता है। बिजली की सुविधा आज भी यहां नहीं है, लेकिन शासन ने पहाड़ी पर एक रेस्ट हाउस बनवाया है, जहां सभी सुविधाएं हैं। इसके साथ ही स्थानीय प्रशासन ने एक सामुदायिक भवन भी बनवा दिया है, जहां देर होने पर ठहरा जा सकता है।
 
 
केंदई स्थित वनवासी आश्रम के पीछे से इस जगह तक कच्ची सड़क के जरिए पहुंचा जा सकता है, यहां बांध के बीच टिहरी सराई और साखो गांव के पास ‘मॉरीशस आईलैंड’ है। बारिश के दिनों में यहां तक जाने वाली कच्ची सड़क बंद हो जाती है और यहां सिर्फ नाव से ही जाया जा सकता है। सामान्य मौसम में यहां कोरबा और अंबिकापुर सहित आसपास से आने वाले लोगों की भीड़ देखी जा सकती है। बिलासपुर, रायपुर से भी लोग अब पहुंचने लगे हैं।
 
 
एजुकेशन टूर पर कालेज के भूगोल विभाग के छात्रों ने इस जगह जाने की इच्छा जताई थी। बांध के बीच ऐसा मनोरम स्थान देखकर आश्चर्य हुआ। खासकर यहां के सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा अद्भुत है। रेस्ट हाउस होने के कारण ठहरने की सुविधा भी है। पर्यटन विभाग को यहां और सुविधा मुहैया कराने की दिशा में पहल करनी चाहिए। बांध के बीच द्वीप पर होने के कारण ही मॉरीशस आईलैंड कहा जाने लगा है। यह प्रदेश के सबसे खूबसूरत जगहों में शामिल है।
डा. पीएल चंद्राकर, भूगोलविद्
 
 
नाव से 12, सड़क से 180
 
 
टिहरी सराई औ साखो गांव बांध के बीच बसे हैं। दोनों गांवों में धनुवार और बिंझवार आदिवासी रहते हैं। दोनों गांवों के बीच नाव से आने-जाने पर महज 12 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है, लेकिन सड़क के रास्ते जाने पर 180 किमी का सफर करना होता है। इसके साथ ही पोड़ी-उपरोड़ा विकासखंड में शामिल होने के कारण सरकारी कामों के लिए आज भी इन आदिवासियों को 150 किमी से अधिक की दूरी तय करनी पड़ती है।
 
 
हजारों पर्यटक, तीन नाव
 
 
छुट्टियों के दिनों में यहां हर रोज हजारों लोग घूमने पहुंचने लगे हैं, लेकिन बांध में मात्र तीन पुराने नाव ही उपलब्ध हैं। यहां आधुनिक नाव, स्टीमर की सुविधा मुहैया कराने से लोग भी सुरक्षित सैर कर सकेंगे, वहीं टिहरी सराई और साखों गांव में रहने वाले आदिवासियों को राहत मिलेगी। इसके साथ ही केंदई से यहां जाने के लिए संकेत बोर्ड लगाने की जरूरत है।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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