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चार दिन पहले ही ‘फिट’ थी, फिर थम गई जीवन की गाड़ी
Bhaskar news | Aug 04, 2012, 03:28AM IST

रायगढ़ में बतौर ट्रेन ड्राइवर पदस्थ बी. अंजलि ने राखी का त्योहार परिवार के साथ मनाने के लिए बुधवार से छुट्टी ली थी। बुधवार की शाम ही वह चरौदा स्थित अपने निवास पहुंची। गुरुवार को घर में राखी की तैयारी चल ही रही थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उसका ब्लड प्रेशर लो होने लगा। परिजन कुछ समझ पाते, इससे पहले ही वह अचेत हो गई। उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। बताया जाता है कि उन्हें अटैक आया था और संभलने का भी मौका नहीं मिला। हर दिन हजारों लोगों को मंजिल तक पहुंचाने वाली अंजलि के जीवन की गाड़ी मुकाम पर पहुंचने से पहले ही हमेशा के लिए थम गई।
अंजलि ने कुछ अलग करने की चाह में ही लोको पायलट का जॉब चुना था। यही वजह है कि बिलासपुर मंडल ही नहीं, बल्कि एसईसीआर में उन्हें सम्मान भरी नजरों से देखा जाता था।
रेलवे अस्पताल से जारी हुआ था आरएमसी
रेलवे स्टाफ का हर महीने फिटनेस चेकअप होता है। अंजलि रायगढ़ में पदस्थ थी, लेकिन वहां मेडिकल इंस्ट्रूमेंट न होने के कारण उन्हें चेकअप के लिए बिलासपुर रेलवे अस्पताल भेजा गया। यहां मंगलवार को डॉक्टरों ने अंजलि का चेकअप कर आरएमसी (रेलवे मेडिकल सर्टिफिकेट) जारी किया था। इसके बाद अंजलि ने एक दिन ड्यूटी की और 2 अगस्त से रक्षाबंधन के लिए छुट्टी ली। एकाएक उनकी मौत ने तमाम चेकअप के बाद जारी किए गए फिटनेस सर्टिफिकेट पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्लर्क का जॉब छोड़कर लोको पायलट बनी थी
बी. अंजलि बिलासपुर डिवीजन के रायगढ़ स्टेशन में पिछले 8 महीने से बतौर लोको पायलट काम कर रही थी। यह वही अंजलि है, जिसने वर्ष 2003 में असिस्टेंट लोको पायलट बनकर कीर्तिमान बनाया था। जोन में वे पहली महिला थीं, जिसने असिस्टेंट लोको पालयट बनने का न सिर्फ साहस दिखाया, बल्कि परीक्षा पास कर महिलाओं के लिए नजीर खींचीं। यही वजह है कि अंजलि अपने महकमे में सबके बीच लोकप्रिय हो गई। अंजलि ने रेलवे में नौकरी की शुरुआत वर्ष 1993 में की थी। पिता बी. नागेश्वर की मौत के बाद उन्हें अनुकंपा नियुक्तिमिली थी और पहली पोस्टिंग रेलवे स्कूल चरौदा में मिली थी। इसे छोड़कर उन्होंने भिलाई लोको शेड में क्लर्क का काम शुरू किया। अंजलि को लोको शेड में ही ट्रेन ड्राइवर बनने की ठानी और वर्ष 2003 में विभागीय परीक्षा पास कर असिस्टेंट ट्रेन ड्राइवर बनी। नवंबर 2011 में प्रमोशन हासिल कर वह ट्रेन ड्राइवर बन गई। अंजलि ने अहमदाबाद, शालिमार, कुर्ला जैसे ट्रेनों का सफल संचालन कर साबित किया कि महिला पुरुषों से किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है।






