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खोज: अब डायबिटीज रोगी भी खा सकेंगे चावल

अनिल मिश्रा | Jul 17, 2012, 04:52AM IST
 
 

रायपुर। डायबिटीज की बीमारी से पीड़ित मरीज अब चावल भी खा सकते हैं। इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने छत्तीसगढ़ में उगाई जाने वाली धान की किस्म ‘स्वर्णा’ को डायबिटिक लोगों के लिए उपयुक्त पाया है। रिपोर्ट के मुताबिक चावल की विभिन्न किस्मों में ग्लाइसेमिक इंडेक्स(जीआई) 48 से 92 तक पाया गया है। अब तक डाक्टर हाई जीआई लेवल होने की वजह से डायबिटीज पीड़ितों को चावल से परहेज करने की सलाह देते रहे हैं। 48 से 55 तक जीआई लेवल को निम्न स्तर का माना जाता है, 56 से 69 को मीडियम और इससे ऊपर हाई लेवल माना जाता है। धान की ‘स्वर्णा’ किस्म में जीआई 48 पाया गया है। यह रिपोर्ट शुक्रवार को मनीला में कृषि वैज्ञानिकों के सम्मेलन में पेश की गई।

रिपोर्ट में कहा गया है कि लो जीआई राइस से डायबिटीज की स्टेज 2 का विकास नहीं होता और मरीज का डायबिटीज कंट्रोल में रहता है। प्रदेश में पिछले कुछ वर्षो में चावल की नई किस्मों का विकास हुआ है लेकिन अब भी लगभग 20 प्रतिशत खेती ‘स्वर्णा’ की होती है। इसके अलावा प्रदेश के बासमती को भी मीडियम जीआई वाली किस्मों में शामिल किया गया है। इसकी फसल लगभग डेढ़ सौ दिनों में तैयार होती है जबकि नई किस्मों में कम समय लगता है।


यही कारण है कि ‘स्वर्णा’ का रकबा धीरे-धीरे घट रहा है। यह कम पानी वाले इलाकों में पैदा होने वाली किस्म है, इसलिए जहां कम पानी होता है वहां किसान ‘स्वर्णा’ की फसल ही लेते हैं। कृषि वैज्ञानिकों ने इससे पहले ओराइजा सेटाइवा नाम की चावल की किस्म जिसे पसई चावल भी कहा जाता है को डायबिटीज में उपयुक्त पाया था लेकिन इसका उत्पादन बेहद कम होता है इसलिए यह काफी महंगा है। विश्व में 3.5 अरब लोगों का मुख्य आहार चावल है। इस नई खोज के बाद डायबिटीज के मरीजों खानपान में काफी राहत मिल सकती है।

दूसरी किस्मों पर भी रिसर्च की जरूरत
प्रदेश के कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यहां चावल की दूसरी किस्मों पर भी रिसर्च होना चाहिए। कृषि वैज्ञानिक एके सरावगी ने दैनिक भास्कर से कहा कि ‘स्वर्णा’ का विकास पुरानी किस्म के मासुरी से किया गया था। इस हिसाब से मासुरी में भी लो जीआई की संभावना है। मासुरी से ही नई किस्म कर्मा मासुरी का भी विकास हुआ है। मूल किस्म एक ही होने से अनुवांशिक गुणों में समानता होनी संभावित है। अगर यहां की दूसरी किस्मों पर भी रिसर्च हो तो बेहतर नतीजे आ सकते हैं।

किसने किया रिसर्च
आस्ट्रेलिया की संस्था कॉमनवेल्थ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च ऑरगेनाइजेशन और इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट मनीला की संयुक्त टीम ने यह रिसर्च किया है। जांच टीम का नेतृत्व सीएसआईआरओ के टोनी बर्ड और आईआरआरआई के डॉ. मेलिसा ने किया।

अभी कह नहीं सकता
डायबिटीज पीड़ितों को लो जीआई आहार की सलाह दी जाती है। किसी आहार के बाद शरीर में जिस तेजी से ग्लूकोस बनता है उसे जीआई से नापा जाता है। चावल की जीआई ज्यादा होती है इसलिए मरीजों को गेहूं, ज्वार, आदि खाने की सलाह दी जाती है। अभी मैंने रिपोर्ट नहीं पढ़ी है इसलिए उसपर कुछ नहीं कह सकता।
डॉ. जीबी गुप्ता, विभागाध्यक्ष मेडिसिन विभाग, डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल, रायपुर
 
 
 

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