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पुलिस के आगे बच्चों को खड़े कर रहे नक्सली
सुदीप त्रिपाठी | Jun 28, 2012, 07:09AM IST

दक्षिण और साउथ बस्तर व गरियाबंद के तीन डिवीजन में बड़े पैमाने पर स्कूली बच्चों की नक्सलियों ने भर्ती की है। इनकी उम्र 13 से 17 साल के बीच की है। उन्हें वे अपने साथ जंगल के कैंप में ले जा चुके हैं। बताते हैं कि ये धुर नक्सल प्रभावित गांवों से हैं। यह काम नक्सलियों के स्मॉल एक्शन ग्रुप की टीम ने किया है। नक्सलियों के टीसीओसी (टैक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैंपेन) सप्ताह (15 जनवरी से 15 जून के बीच) के दौरान नक्सलियों ने पुलिस पर हमले कर उनका ध्यान भटकाया और बच्चों की भर्तियां की गईं। पुलिस के इंटेलीजेंस को इस बात की जानकारी भी मिली, लेकिन नक्सलियों को रोका नहीं जा सका।
नक्सलियों ने बरसात के लिए अपनी रसद जुटाने का काम भी शुरू कर लिया है। अलग-अलग इलाकों से नक्सली इस काम में लगे हैं। उन्होंने जंगल में अलग-अलग जगहों पर सुरक्षित कैंप बना रखे हैं, जहां उनके फोर्स और स्कूली बच्चों की ट्रेनिंग होगी। ट्रेनिंग के लिए अलग-अलग डिवीजन के तमाम दलम कमांडों को जिम्मेदारी सौंपी गई है।
छत्तीसगढ़ में बाल संघम और बाल दस्ता के नाम से तैयार की गई फोर्स का गठन हाल ही में किया गया, जबकि झारखंड, ओडिशा और प.बंगाल में यह काम पिछले कई सालों से नक्सली करते आए हैं।
एसएजी फोर्स में भी बच्चों की टीम
नक्सलियों की एसएजी (स्मॉल एक्शन ग्रुप) की टीम भी बच्चों को जोड़कर तैयार की गई है। इसमें ट्रेंड स्कूली बच्चे हैं, जो आमतौर पर स्कूली ड्रेस पहनकर गांव और आसपास के शहरों में सक्रिय रहते हैं। इस बात की पुख्ता जानकारी मिली है कि स्कूली बच्चों की टीम ने ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल के काफिले पर भी हमला किया था। नक्सलियों के साथ मिलकर नक्सलियों ने बस्तर, दंतेवाड़ा और जगदलपुर के कई इलाकों में पुलिस, सलवा जुडूम और ग्रामीणों की हत्या की। सूत्रों के मुताबिक बच्चों की टीम हाल के नक्सल धमाकों में भी शामिल रही।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में भी खुलासा
संयुक्त राष्ट्र की 15 दिन पहले जारी वार्षिक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हो चुका है कि छत्तीसगढ़ में बच्चों को बड़ी संख्या में नक्सली बनाया जा रहा है। कम उम्र के बच्चों को हथियारों की ट्रेनिंग दी जा रही है। उन्हें एक तरह से मानव बम और हथियार बनाकर इस्तेमाल किया जा रहा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि बाल दस्ता, बाल संघम और बाल मंच के नाम से बच्चों की अलग-अलग नक्सल फोर्स तैयार की गई है।
इसलिए बच्चों की आड़
बच्चों को नक्सली मानसिक रूप से जल्दी अपने पक्ष में तैयार कर लेते हैं। वे बड़ी आसानी से उनके तरफ होकर उनके लिए समर्पण भाव से जान देने और लेने को तैयार हो जाते हैं।
ट्रेनिंग के बाद बच्चों में फुर्ती ज्यादा रहती है। युद्ध में ज्यादा उम्र वालों की अपेक्षा कम उम्र के नौजवान ज्यादा साहसिक प्रदर्शन करते हैं। कमांडरों के आदेश का पालन भी बच्चे बखूबी करते हैं।
बच्चे पुलिस की पहचान में जल्दी नहीं आते। आमतौर पर स्कूली ड्रेस पहनने की वजह से उन्हें पहचाना नहीं जा सकता। नक्सली उनके इस पहनावे और मासूम चेहरे का फायदा उठाते हैं।
नक्सलियों ने बच्चों के कई नए दलों का गठन किया है। इनकी ट्रेनिंग बरसात में शुरू होने वाली है। यह बेहद ही चिंताजनक स्थिति है। पुलिस नक्सलियों के कैंप को सर्च करने का ऑपरेशन चलाएगी। कोशिश रहेगी कि नक्सली इस काम में कामयाब न हो पाएं।
राम निवास, एडीजी, नक्सल ऑपरेशन







