खनिज विभाग के नाकों को भी हाईटेक किया जाएगा जिसमें कार्ड पंच करते ही रायल्टी का हिसाब अपने आप हो जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निर्देश पर खनिज विभाग आधुनिकतम तकनीक पर आधारित इस व्यवस्था को साकार करने में जुटा है।
इसके लिए 10 करोड़ का प्रोजेक्ट बनाया गया है जिसे जल्द ही स्वीकृति के लिए शासन को भेजा जाएगा। इसके बाद आईटी कंपनियों से टेंडर मंगाए जाएंगे और नक्शों को डिजिटल बनाने का काम शुरू होगा। यह लंबी परियोजना है और इसमें दो-तीन साल का समय लगेगा।
केंद्रीय खनिज मंत्रालय और इंडियन ब्यूरो आफ माइंस ने 2008 में देश के पांच जिलों में इंटरनेट, सेटेलाइट और जीआईएस पर आधारित व्यवस्था बनाने के लिए पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया था। प्रदेश से इसके तहत दुर्ग जिले का चयन किया गया था। रीजनल रिमोट सेंसिंग एजेंसी नागपुर ने वहां काम शुरू किया लेकिन कागजों में बने मज मूली नक्शे और सेटेलाइट से मिलने वाले डिजिटल नक्शे में अंतर की समस्या से मामला अटक गया।
दरअसल पचास साल पहले बनी ट्रोपोशीट में एवरेस्ट पर्वत को आधार मानकर नक्शे निर्धारित किए गए हैं। सेटेलाइट से मिलने वाले नक्शों में कोआर्डिनेट बिंदु अलग होने से दोनों का मिलान नहीं हो सका। जिओ रिफ्रेंस में अंतर की दिक्कत से पायलट प्रोजेक्ट सफल नहीं हुआ। अब मज मूली नक्शों को पहले डिजिटल बनाया जाएगा उसके बाद सेटेलाइट और कम्प्यूटर से इसे जोड़ा जाएगा।
कंप्यूटर पर दिखेंगी खदानें
विभाग की इस हाईटेक परियोजना के पूरा होने के बाद प्रदेश भर की खदानें दफ्तर के कम्प्यूटर पर दिखने लगेंगी। ऑन लाइन सर्वे के बाद खदान का आबंटन आफिस से बैठे-बैठे किया जा सकेगा। इस तकनीक को वेबइनेबर्ड कहा जाता है। इसके तहत इंटरनेट और जीआईएस पर आधारित आईटी व्यवस्था बनाई जाएगी। एम टीआरएफ या माइनिंग टिनामेंट रजिस्ट्रेशन सिस्टम में डाटा का रिसोर्स, कंपाइलेशन और प्रेजेंटेशन सबकुछ ऑन लाइन होगा। माइनिंग पर भी नजर रखी जा सकेगी।
टीपी के बदले जारी किए जाएंगे स्मार्ट कार्ड
खनिज विभाग वाहनों में जीपीएस लगाएगा और टीपी की जगह बारकोडेड कार्ड जारी किया जाएगा। नाके कम्प्यूटराइज्ड होंगे जहां कार्ड पंच करते ही ट्रांजिट पास की एंट्री हो जाएगी। रायल्टी का भुगतान करने के लिए भी अब बैंक की लाइन में नहीं लगना पड़ेगा। इंटरनेट बैंिकंग से खनिज विभाग के खाते में पैसे ट्रांसफर किए जा सकेंगे। गुजरात, राजस्थान, ओडिशा तथा कुछ अन्य राज्यों के कुछ जिलों में यह प्रयोग सफल साबित हुआ है।
योजना की कमियां
कम्पलीट मैनेजमेंट ऑफ मिनरल रिसोर्सेस की इस परियोजना में कुछ व्यवहारिक दिक्कतें भी हैं। बड़ी समस्या कर्मचारियों की कम्प्यूटर में दक्षता की है। दूरस्थ इलाकों में खदानें ऐसी जगहों पर हैं जहां बिजली नहीं है। छोटे खदान मालिकों को आईटी व्यवस्था बनाने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। टेंडर में यह तय किया जा रहा है कि जिस आईटी कंपनी को यह काम दिया जाएगा उसे तीन साल तक इसकी देखरेख करनी होगी। कर्मचारियों को ट्रेनिंग भी आईटी कंपनी ही देगी।
इंटरनेट और जीआईएस आधारित आईटी व्यवस्था बनाने की योजना मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की है। तकनीकी कारणों से काम पिछड़ा है लेकिन अब जल्द ही टेंडर निकालने की तैयारी है।
- अनुराग दीवान संयुक्त संचालक एवं परियोजना इंचार्ज, खनिज विभाग