ये बॉक्सिंग चैम्प अब तक चलाती थी सैलून, जानते हैं क्य़ों..
Source: विजय शर्मा | Last Updated 01:28(05/02/12)
रायपुर/कोंडागांव(जगदलपुर)। सुनीता सेन, 12वीं कक्षा की छात्रा। अकसर बीमार रहने वाले पिता के सैलून पर शेविंग-कटिंग भी करती है। लेकिन पढ़ाई और सैलून के काम के बीच सुनीता ने नाम कमाया है बॉक्सिंग में। वह नेशनल लेवल पर खेलने जा रही है। नक्सली इलाके में स्थित ग्रामीण अंचल के लोगों को उस पर नाज है।
सुनीता और बॉक्सिंग का रिश्ता वॉलीबॉल के जरिए बना। कोंडागांव से 20 किमी दूर है चिपावंड, जहां की निवासी है सुनीता। २क्१क् में स्कूल की टीम से वह जगदलपुर वॉलीबॉल खेलने गई थी।
सुनीता का प्रदर्शन तो अच्छा रहा, लेकिन टीम हार गई। मेहनत के बावजूद मिली हार से सुनीता मायूस थी। ऐसे में स्पोर्ट्स टीचर ने उसे बताया कि उनके स्कूल से बॉक्सिंग में किसी ने हिस्सा नहीं लिया है।
वॉलीबॉल खेलने से उसके हाथों में दम तो है ही, चाहे तो मुट्ठी बनाकर उसे बॉक्सिंग में आजमा ले। सुनीता को बात जम गई कि इस खेल में अपनी जीत-हार की जिमेदार वह खुद होगी।
रिंग में उतरी सुनीता के पंच ने कमाल कर दिया। फिर जनवरी 2011 में स्टेट चैंपियनशिप टूर्नामेंट में हिस्सा लेने भिलाई पहुंची। यहां भी पहला स्थान पाया। सुनीता को नेशनल चैंपियनशिपका इंतजार है, जो भोपाल में होने वाली है। सुनीता फिलहाल विधान पाठक से ट्रेनिंग ले रही है। राष्ट्रीय स्तर पर चयन होने पर पंचायत ने उसका समान किया है। दस्ताने और पंचिंग बैग दिए हैं।
अब सुनीता की चिंता परिवार का भरण-पोषण है। तीन बहनों और भाई में मंझली सुनीता बचपन से ही पिता के काम में हाथ बंटाती रही है। अब जबकि पिता ज्यादातर बीमार रहते हैं तो सैलून की जिमेदारी पूरी तरह सुनीता पर ही है। वह कहती है कि ट्रेनिंग के चलते सैलून और पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। जबकि परिवार का सहारा तो सैलून से होने वाली कमाई ही है।