रायपुर।विपरीत परिस्थितियों से लड़ने वालों के कदम को कोई नहीं रोक पाया है। राजधानी में भी ऐसे ही कुछ लोग हैं जिनके हौसले को तोड़ने के लिए हर तरफ से कोशिश हुई लेकिन न तो वे झुके और न ही रुके। आज ये दूसरों के लिए प्रेरणा बन कर समाज को एक नई दिशा दे रहे हैं। डीबी स्टार रिपोर्टर संदीप राजवाड़े और दिलीप जायसवाल की रिपोर्ट..
नौकरी छोड़ी पर समझौता नहीं
अमिताभ गंगोपाध्याय, रिटायर्ड रेलवेकर्मी, रहवासी, गुढ़ियारी
गार्ड के पद पर पहली पोस्टिंग भिलाई में हुई। तब से ही विभाग की गड़बड़ियों को लेकर पड़ताल करने लगा। 1995 में रायपुर आया। उस दौरान सूचना का अधिकार जैसा कोई कानून नहीं था लेकिन अपने स्तर पर लगा रहा। इसी दौरान किसी वजह से 2001 में दल्ली राजहरा ट्रांसफर कर दिया गया। इसके खिलाफ भूख हड़ताल की धमकी दी तो अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि कुछ दिनों में वापस बुला लेंगे। सवा दो साल तक वहां रहा। जब आर.टी.आई. के रूप में बड़ा शस्त्र मिला तो इसके माध्यम से 2007 में उजागर किए एक मामले पर उच्चाधिकारियों को दिल्ली तलब किया गया। इसी साल मुझे हार्ट अटैक आया जिसके बाद नियम के तहत ऑफिस वर्क दे दिया गया। 30 दिसंबर 2007 को रायपुर पी.आर.ओ. में ज्वॉइनिंग का आदेश हुआ पर उच्च अधिकारियों ने मुझे ज्वॉइन नहीं करने दिया।
आखिरकर अप्रैल में मैं पदस्थ हुआ। 9 अगस्त 2008 को अचानक मेरा ट्रांसफर सीनियर डी.सी.एम. के अंतर्गत कर दिया गया। इसके बाद भी 26 अक्टूबर तक मुझे कोई काम नहीं दिया गया। 14 नवंबर को सी.आई.सी. ने आर.टी.आई. के तहत निकाली गई एक जानकारी में अधिकारियों को दिल्ली तलब किया गया। इसको लेकर पहली बार सीनियर डी.सी.एम. ने इन मामलों से दूर रहने को कहा। 30 नवंबर को फिर से ए.डी.आर.एम. दफ्तर में ट्रांसफर किया गया। यहां भी 6 दिसंबर तक न तो बैठने की जगह दी गई न ही कोई काम। सुबह 9.45 से शाम 6.15 बजे तक मैं दफ्तर और कैंटिन के बीच भटकता रहा।
इस दौरान सूचना का अधिकार से रेलवे में हुए ठेके, इंजीनियरिंग वर्क, आवासीय गड़बड़ी, सफाई सहित अन्य मामलों की जानकारी निकलवाता रहा। ए.डी.आर.एम. से कई बार बैठने की जगह और काम देने की मांग की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। 9 फरवरी 2009 को मैंने इस मामले में किए गए पत्र व्यवहार की कॉपी के साथ पूरी जानकारी डी.आर.एम. को सौंपी पर मार्च तक कोई एक्शन नहीं हुआ। त्रस्त होकर 2 अप्रैल को ए.डी.आर.एम. को पत्र लिखकर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति विकल्प मांगा। चार दिन बाद मुझे टर्मिनेशन लेटर सौंप दिया गया। बाद में आर.टी.आई. में निकाली गई जानकारी में बताया गया कि टर्मिनेशन नहीं स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दी गई है। नौकरी के दौरान और अब भी लगातार धमकी मिल रही है कि घपले उजागर मत करो, आर.टी.आई मत लगाओ। मैंने अपने जीवन में गलत काम को लेकर कभी समझौता नहीं किया और न ही भ्रष्टाचार के आगे झुका। आगे भी मेरी मुहिम जारी रहेगी।
सपने पूरे कर रही हूं
दर्शन नरवाल, रहवासी, मौदहापारा
मैं दिल्ली की रहने वाली हूं और मेरे पति जे.एस. नरवाल विंग कमांडर थे। 2007 में रायपुर आने के बाद पति के साथ मैं शौकिया तौर पर डिवाइडर, खड़े वाहनों, साइकिल, ऑटो, ट्रक में रेडियम पट्टी लगाने लगी। मकसद था रात के समय रेडियम लगाकर वाहनों को दुर्घटना से बचाना। किडनी खराब होने की वजह से 19 अप्रैल 2008 में उनका देहांत हो गया। इसके बाद मुझे लगा कि जीवन ही खत्म हो गया। मेरी हालत देख छोटी बेटी मुझे अपने पास दक्षिण अफ्रीका ले गई पर वहां भी उबर नहीं पाई।
इस दौरान आगरा में रहने वाली मेरी सहेली मीता पोद्दार ने मुझे जीने की नई राह दी। 2008 में अपनी 80 वर्षीय मां को लेकर रायपुर आ गई। अब अपने स्तर पर ही रेडियम लगाने का काम करती हूं। अब असहाय और जरूरतमंदों की मदद कर रही हूं। इस तरह पति के सपनों को पूरा करने में लगी हूं। कुछ साथी भी मेरी इस मुहिम में जुड़े हुए हैं।