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आतंक का गुरु अफजल चाहता था आडवाणी बनें देश के प्रधानमंत्री क्योंकि ...!

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नई दिल्ली.  आखिरकार अफजल गुरु को फांसी पर लटका दिया गया। ठीक उसी तरह जैसे 80 दिन पहले कसाब को फांसी दी गई थी।

संसद पर हमले के दोषी अफजल को शनिवार सुबह 7.50 बजे फांसी दी गई और करीब 8:30 बजे तिहाड़ के जेल नंबर तीन के पास दफन भी कर दिया गया।

केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने सबसे पहले फांसी दिए जाने की जानकारी दी। इसके फौरन बाद कश्मीर के कई इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया।

अफजल के परिवार वालों ने शव देने की मांग की है। हालांकि, सरकार ने हालात न बिगड़े, इस वजह से शव नहीं देने का फैसला किया है।

इस बीच अफजल की पत्नी ने आरोप लगाया है कि उन्हें फांसी की सूचना नहीं दी गई थी। लेकिन आरके सिंह ने इससे इनकार किया है। उन्होंने कहा कि स्पीड पोस्ट और सामान्य डाक से उसके परिवार को बता दिया गया था। इसके साथ ही पुलिस से इस बारे में जानकारी भी जुटा ली गई थी।

2008 में कहा था-यूं तिल-तिल कर मरने से अच्छा है मौत दे दो, लेकिन ये सरकार फांसी भी नहीं देती।

2008 में अफजल ने एक इंटरव्यू दिया था। इसमें उसने कहा था कि वह तिल-तिलकर मरना नहीं चाहता। लेकिन यूपीए सरकार उसे फांसी नहीं देगी। इसलिए उसकी मंशा है कि भाजपा की सरकार बने और आडवाणी प्रधानमंत्री बनें। उसका कहना था कि वह एकमात्र व्यक्ति हैं, जो उसकी फांसी पर जल्द फैसला ले सकते हैं। अफजल को सुप्रीम कोर्ट से वर्ष 2005 में सजा-ए-मौत मिली थी।

कड़े फैसले के 4 बड़े किरदार

1. सोनिया गांधी जिन्होंने मंजूरी दी :

सोनिया गांधी ने 13 दिसंबर 2012 को गृहमंत्री से अफजल पर अपडेट मांगा था। उन्हें तेजी से मामला निपटाने को कहा था।
जयपुर चिंतन शिविर के बाद ही भाजपा के हाथ से हर वो मुद्दा छीनने की रणनीति बनी जो चुनाव में नुकसान पहुंचा सकती थी।
शुक्रवार को कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक में सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह से चर्चा के बाद शिंदे को हरी झंडी दे दी गई।


2. सुशीलकुमार शिंदे ने तेजी दिखाई :


21 जनवरी को गृहमंत्री ने अफजल पर राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब भेजे।
3 फरवरी को राष्ट्रपति भवन से दया याचिका खारिज होने की सूचना गृह मंत्रालय को मिल गई।
गृहमंत्री ने फौरन प्रधानमंत्री को जानकारी दी। 8 फरवरी को कांग्रेस कोर ग्रुप ने फैसले का सम्मान करने को कहा।
शिंदे ने उमर अब्दुल्ला और जेल प्रशासन को सूचना भेजी। शाम को फांसी की तारीख और समय तय कर लिया गया।
रात 8 बजे जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री को सूचना दी और 1 फरवरी को तिहाड़ के बैरक नंबर 3 में 8 बजे फांसी दे दी गई।


3. प्रणब मुखर्जी ने मुहर लगाई :

प्रणब ने दया याचिका की फाइलें निपटाने में तेजी दिखाई। कसाब की फाइल 1 महीने, जबकि अफजल की फाइल उन्होंने 12 दिन में निपटाई।
आतंकवाद से जुड़े दो हाई प्रोफाइल दया याचिका ठुकराकर प्रणब ने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति की परंपरा तोड़ दी।
इससे पहले प्रतिभा पाटील ने 5 साल के कार्यकाल में 35 फांसी की सजा माफ कर दी थी।

4. ...और नरेन्द्र मोदी जो वजह बने :

कांग्रेस कतई नहीं चाहती कि चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी को हिंदुत्व या राष्ट्रीय सुरक्षा पर कांग्रेस और सरकार को घेरने का मौका दिया जाए।
सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी द्वारा यह कहना कि गुजरात के दंगाई अभी तक खुले घूम रहे हैं, लेकिन हमने दोषियों को अंजाम तक पहुंचाया, से फैसले पर मोदी का असर साफ नजर आता है।

मायने : सरकार सॉफ्ट स्टेट की छवि तोडऩे में सफल होगी

तमाम आशंकाओं, धमकियों को नजरअंदाज कर जिस प्रकार फैसला लिया, उससे सॉफ्ट स्टेट की छवि टूटेगी।
जी पार्थसारथी के शब्दों में, कसाब और अफजल से मैसेज जाएगा कि हम अब सख्त फैसले ले सकते हैं।
भगवा आतंक पर घिरी सरकार हर तरह के आतंकवाद को एक ही नजरिये से देखने का दावा कर सकेगी।
हिंदू संगठनों की मालेगांव, समझौता जैसी घटनाओं के बहाने घेरेबंदी पर सरकार निश्चिंत रहेगी। तर्क देगी कि हम बिना किसी भेद-भाव के आतंकवाद से निपटते हैं।

असर : हिंदू आतंकवाद पर घिरी सरकार आक्रामक होगी

हिंदू आतंकवाद पर घिरे गृहमंत्री और सरकार 21 फरवरी से शुरू हो रहे बजट सत्र में आक्रामक मुद्रा में होंगे।
सरकार को घेरने की भाजपा व विपक्ष की कोशिशों का सामना करना कांग्रेस व सरकार के लिए आसान होगा। 
सरकार अब मोदी और भाजपा की हिंदुत्व ब्रांड छवि का जवाब कसाब-अफजल पर लिए गए फैसलों से देगी।
कांग्रेस की टिप्पणी- लोगों को तय करने दीजिए उन्हें राष्ट्रवादी छवि चाहिए या फिर हिंदुत्ववादी। इससे लगता है इस वर्ष कई राज्यों में होने वाले चुनाव में कांग्रेस इसे मुद्दा बनाएगी।


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