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एम्स पर लगते रहे हैं भेदभाव के आरोप

धनंजय कुमार-अरविंद | Mar 05, 2012, 08:01AM IST
नई दिल्ली. एम्स प्रशासन पर आरक्षित वर्ग के छात्रों और डॉक्टरों के साथ भेदभाव बरतने के आरोप का इतिहास काफी पुराना है। कभी मेरिट में आने के बाद भी प्रवेश न देने तो कभी लोअर कास्ट की वजह से फेल करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं, लेकिन आरोपों की सघन जांच करने के बजाय प्रशासन मामलों की अनदेखी ही करता रहा है।


प्रशासन की यही अनदेखी अब आरक्षित श्रेणी के छात्रों और डॉक्टरों पर भारी पड़ने लगी है। शायद यही वजह है कि एक बार फिर एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे एक छात्र ने आत्महत्या कर ली। आरोप है कि फेल होने से परेशान छात्र की लाख कोशिशों के बावजूद आला प्रशासनिक अधिकारियों ने उससे मुलाकात तक नहीं की। ऐसे में वह तनावग्रस्त हो गया और आखिरकार उसे ऐसा घातक कदम उठा लिया।


गौरतलब है कि पिछले वर्ष मार्च महीने में सागर (मध्य प्रदेश) के रहने वाले बालमुकुंद भारती ने भी फांसी लगाकर जान दे दी थी। वह कम्युनिटी मेडिसिन का छात्र था। भारती के छोटे भाई कृष्ण कांत भारती का कहना था कि अनुसूचित जाति का होने के कारण एक प्रोफेसर पहले साल से ही उसे प्रताड़ित करने लगे थे और जानबूझकर बालमुकुंद को कम्युनिटी मेडिसिन जैसे आसान विषय की प्रैक्टिकल परीक्षा में फेल कर दिया गया था।


उसके साथ चार अन्य छात्र भी फेल हुए थे, लेकिन उन्हें पास कर दिया गया। इसके चलते वह तनाव ग्रस्त हो गया था और आत्महत्या कर ली थी। रविवार को आत्महत्या करने वाला छात्र भी ओबीसी वर्ग का था। उसके दोस्तों का कहना है कि पढ़ाई को लेकर काफी गंभीर होने के बावजूद वह फेल हो गया था। कई बार उसने एम्स निदेशक डॉ. आर सी डेका से मिलने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो पाया था।


सिफारिशें कूड़ेदान में


लगातार लग रहे आरोपों के मद्देनजर केंद्र सरकार ने सितंबर 2006 में प्रो. थोराट की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था, जिसने 5 मई 2007 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट के मुताबिक एम्स में आरक्षित वर्ग के छात्र ही नहीं, बल्कि फैकल्टी भी हर स्तर पर गंभीर भेदभाव का शिकार होते हैं। छात्रों की व्यावहारिक दिक्कतों को दूर करने के लिए उन्हें इंग्लिश स्पीकिंग और पर्सनेलटी डेवलपमेंट कोर्स कराने की सिफारिशें की गई थीं।


इसके अलाव, हॉस्टलों में निगरानी कमेटी बनाने के साथ तमाम अन्य सिफारिशें की गई थीं। इसके बाद पिछड़े और कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स शुरू भी किया गया था, लेकिन कुछ दिन बाद ही इसे बंद कर दिया गया था। बताते चलें कि वर्ष 2006 में एक एससी कैटेगरी के स्टूडेंट्स के साथ हॉस्टल में जातिगत भेदभाव की शिकायत दर्ज कराई गई थी। इसके अलावा, विभिन्न कोर्सो में प्रवेश और नियुक्तियों में आरक्षण की अनदेखी के भी करीब दर्जन भर मामले सामने आ चुके हैं।


तनाव के चलते चुनी आत्महत्या की राह!




नई दिल्ली . ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (एम्स) में एमबीबीएस प्रथम वर्ष के छात्र अनिल कुमार की आत्महत्या के कारणों को जानने के लिए हॉस्टल प्रबंधन की तरफ से एक समिति तो गठित कर दी गई है, लेकिन परिस्थितियां बताती हैं कि उस पर अपने गरीब परिवार की उम्मीदों पर खरा उतरने का काफी दवाब था।


इसके कारण जब वह शुरुआती परीक्षा के कुछ पेपरों में फेल हो गया तो भविष्य को लेकर आशंकित हो गया और इसी आशंका ने उसे इस कदर अवसाद से भर दिया कि उसने आत्महत्या की राह चुन ली। एम्स के प्रवक्ता वाईके गुप्ता ने भी माना है कि छात्र ने अवसाद के चलते यह कदम उठाया है। जानकारी के मुताबिक अनिल कुमार के पिता सूरज कुमार मीणा राजस्थान के पिछड़े जिले बारन में ही खेती-बाड़ी करते हैं। उसके परिवार में चार बड़े भाई और मां हैं।


बताते हैं कि अनिल की हाजिरी भी कॉलेज में कम थी, जिसके चलते वह परेशान रहने लगा था। फिर जब वह परीक्षा में फेल हो गया तो भविष्य के प्रति आशंकित रहने लगा। पुलिस सूत्रों के मुताबिक उसके दोस्तों से की गई पूछताछ में पता चला है कि हताश अनिल अपने परिवार के बारे में बात करता रहता था।


उसे लगता था कि वह उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरेगा। इसी के चलते वह अक्सर ज्यादा समय हॉस्टल के अपने कमरे में ही बिताने लगा था। पुलिस के मुताबिक अनिल के दोस्तों से पूछताछ में यह बात भी सामने आई है कि अंग्रेजी में व्याख्यानों को समझने में भी वह दिक्कत महसूस करता था। इसको ही वह अपने फेल होने का कारण भी मानता था। पुलिस की तरह ही एम्स प्रबंधन भी मानता है कि यह मामला पूरी तरह डिप्रेशन का है।
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