नई दिल्ली। आजादी के बाद दिल्ली के विजय चौक पर सबसे बड़ा जनसैलाब उमड़ा। आश्चर्य की बात यह है कि ग़दर के लिए अमादा इस जनसमूह का कोई नेता नहीं था।
फिर भी लोग लगातार आगे बढ़ते जा रहे थे। उनका मकसद राष्ट्रपति भवन तक पहुंचना था। द्वितीय विश्वयुद्ध के शहीदों की याद में बने इंडिया गेट से शुरू हुआ यह काफिला लगातार आगे बढ़ रहा था।
राष्ट्रपति भवन से कुछ कदम की दूरी पर पुलिस ने बैरीकेडिंग कर रखी थी। उन्हें शायद यह अंदाजा नहीं था कि बेहद युवा इन लड़के-लड़कियों की जो भीड़ सीना ताने लगातार उनकी ओर बढ़ रही है, वह एक इतिहास गढ़ रही है।
22 दिसंबर की दोपहर विजय चौक पर उमड़ा यह जनसैलाब रुकने को तैयार नहीं था। पुलिस बैरीकेडिंग को फांदने में असमर्थ लड़कियां आस-पास लगे बिजली के खम्भों पर चढ़ गईं।
भीड़ भले ही रुक गई लेकिन, उसका गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था। पुलिस को समझते देर न लगी कि अगर इस भीड़ को जल्द से जल्द तितर-बितर न किया गया तो बड़ा बखेड़ा खड़ा हो सकता है।
पानी की तेज बौछारों के साथ शुरू हुआ लाठीचार्ज। पुलिस और इस आक्रोशित जनसमूह के बीच संघर्ष दोपहर से शुरू हो पूरी रात चलता रहा। अगला दिन रविवार का था। पुलिस को डर था कि अगले दिन मामला और भी गंभीर हो सकता है।
सुबह होते-होते आंदोलनकारियों को जबरन बसों में भरा गया और उन्हें दिल्ली से बाहर भेजा जाने लगा। नई दिल्ली के इस पूरे इलाके (विजय चौक से इंडिया गेट तक) को पुलिस छावनी में बदल दिया गया और धारा 144 लागू कर दी गई।
इस तरफ आने वाले सभी रास्ते सील कर दिए गए, यहां तक कि इलाके से गुजरने वाली मेट्रो ट्रेनों को यहां न रुकने का आदेश जारी कर दिया गया। बावजूद इसके रविवार को जो हुआ, वह शनिवार से भी ज्यादा उग्र और व्यापक था।
23 दिसंबर के दिन पुलिस ने आंसू गैस, वाटर कैनन और लाठीचार्ज की बदौलत इस आक्रोश को दबाने की कोशिश की। लेकिन, लोगों का गुस्सा डर और दर्द के खौफ को पार कर चुका था।
दिल्ली में एक छात्रा के साथ चलती बस में हुए गैंगरेप (16-17 दिसंबर के रात) की दिल दहला देने वाली घटना से उपजा जनाक्रोश सत्ता के दरवाजे से तब तक जाने के लिए तैयार नहीं है, जब तक कि उसके द्वारा बलात्कार और बलात्कारी के विरुद्ध किसी कठोर सजा की घोषणा नहीं की जाती।