विज्ञापन
 
Home >> Abhivyakti >> Hamare Columnists >> Others >> Leader Or Activist

पुरानी परछाइयों तले नया साल

मृणाल पाण्डे | Jan 02, 2013, 01:52AM IST
 
 

तेरह  दिन तक मौत से जूझने के बाद अंतत: उस अनाम लड़की की जीवन यात्रा खत्म हो गई। अंत तक सिर्फ मां में ही यकीन बचा था कि बेटी बच जाएगी। उस टूटे यकीन को अब कोई क्या सांत्वना दे? अब तक देश का इस बाबत रहा-सहा भ्रम भी मिट गया है कि सड़क पर आकर नारी शक्ति का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान या नार्यस्तु यत्र पूजयंते नुमा गलदश्रु नारे लगाकर या ‘मुजरिम को अभी इसी वक्त चौरास्ते पर फांसी दो!’ की गुस्सैल मांग बुलंद कर महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने की सफल मुहिम छेड़ी जा सकती है।
 
अगर महिलाओं के दर्द से यह देश इस बार सचमुच हिल गया है, तो 2013 में हिंसक हिस्टीरिया या व्यवस्था को हूट करने के आसान रास्तों का मोह हमको त्यागना होगा। इस दारुण अनुभव से सबक लेकर हम अपने राज, समाज तथा दंडविधान तीनों के विवेचन और परिमार्जन का काम जनता के विवेकी प्रतिनिधियों और वैधानिक तौर से अधिकृत संस्थाओं को एक मंच पर लाकर शुरू कराएं, यही उस बेटी के प्रति सही श्रद्धांजलि होगी। 
 
आजादी के बाद भी मर्दानगी की जो गलत समझ हमारी सामंती, पुरुषवर्चस्ववादी परंपरा और भाषा कायम रखे हुए है, वह लोकतांत्रिक भारत में औरतों को घरों के भीतर-बाहर हर रोज नई और तकलीफदेह परिस्थितियों से रूबरू कराती है। तिस पर मीडिया के अमानवीय बॉलीवुडीकरण ने विमर्श की जैसी गरज-तरज और धौंस भरी शैलियां हमारे यहां गए बरसों में रच दी हैं, उनके चलते नारी समता और गरिमा बहाली की मांग को लेकर उठा युवाओं का प्रदर्शन किसी अजायबघर में शेर के पिंजरे के भीतर एक मेमने की उपस्थिति का नाटक बनता गया।
 
सहज शांतिमय विरोध बेकाबू होने लगा तो पुलिस को नियंत्रण को कहा गया। साफ निर्देशों के अभाव में अपनी पारंपरिक पुलिसिया शैली में वह जैसी डंडा भंजाई कर सकती थी, उसने की। अब विमर्श का रुख पुलिस की आलोचना तथा प्रशासन की भीतरी लड़ाइयों की तरफ मुड़ गया। और पढ़ी-लिखी मध्यवर्गीय युवतियों को लेकर कोलकाता से लेकर मध्यप्रदेश तक से नेताओं के मुख से लगातार जो निहायत वाहियात टिप्पणियां सामने उमड़ीं, उनसे राजनीतिक दल भले खिसियाये हों, असल मुद्दा हल्का और हाशिए का बन गया। 
 
हम कह सकते हैं कि सोशल तथा पारंपरिक मीडिया से लगातार सचित्र सूचनाएं पाकर युवाओं की एकजुटता संभव बनी, पर इस गंभीर विषय पर उनकी जानकारी सतही और रूढ़िपरक ही सुनाई दी। चौराहे से खंभों तक परचम लहराते युवाओं और चीखते हिस्टेरिकल चेहरों के क्लोजअप बार-बार दिखाने से एक अहम लोकतांत्रिक आंदोलन की शक्ल इतनी फिल्मी बन गई कि देश के आगे हर आयुवर्ग के नागरिकों से गंभीर विमर्श करने, जनता को उसका सामूहिक दाय समझाने और एक समयबद्ध सामूहिक मांगपत्र गढ़कर उसे नए कानून बनाने को अधिकृत वर्मा समिति तक तुरंत पहुंचाने का एक नायाब अवसर खो गया।
 
हम लाख गालियां दें, पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा सिर्फ सरकारी कानून या दंडव्यवस्था नहीं रोक सकते। हमारे जैसे मिश्रित बहुधर्मी समाज में सरकार समाज का नियमन कर सकती है, संचालन नहीं। उससे इसकी जायज जवाबदेही अवश्य तय की जा सकती है कि उसके कानून समयानुकूल बनें, उनको तोड़ने या बाधित करनेवालों को तुरंत पकड़कर अपराधानुसार दंड मिले, पुलिस तथा न्यायतंत्र अधिक सक्षम और कमजोर वर्गो के प्रति संवेदनशील बनें। लेकिन पुलिस भी तो मध्यवर्ग का अंग है। और वह भी हमारी ही तरह राजनेताओं के आचरण व ताकत से सहमा और असहज है। काम के बोझ से दबे किसी कांस्टेबल की अकाल मृत्यु से उसका परिवार भी भारी तकलीफ से गुजरता है। टीवी पर जो रायबहादुर पुलिस को पूरी तरह से औरतों का शत्रु और नेताओं को एकदम नाकारा बता रहे हैं, उनसे इस बारे में कोई वाजिब जानकारी नहीं मिलती कि अगर बलात्कार विषयक कानून को कठोरतर बनाना हो और पुलिस को अधिक कारगर, तो यह काम विधायिका व प्रशासन की बजाय कोई और नहीं कर सकता।
 
दिवंगता के शवदाह के दिन लगभग वैसे ही अन्य बलात्कार की घटना बताती है कि जंतर-मंतर के बाहर राजधानी अपार है और देश भी। जनता का जो विराट अंश इस प्रदर्शन से बाहर है, उसके बड़े भाग में औरतों को लेकर सोच अभी भी निपट प्रतिगामी है। आम तौर से औसत अकल के भारतीय पुरुष (जिसमें सांसद भी शामिल हैं) लाखों यौन कुंठाओं और वर्जनाओं के बीच जीते रहे ग्रामीण से शहरी बनते युवकों, युवतियों के मन का भूगोल कतई नहीं समझते। न ही गए बरसों में पढ़ने, कमाने वाली औरतों की बढ़ती तादाद और संचरणक्षमता से उपजी चुनौतियों को समझने और उनकी समुचित सुरक्षा को लेकर कोई गहरी सोच और संवेदनशीलता उनके भीतर जागी है। 
 
इस आंदोलन की सबसे बड़ी सार्थकता यह रही कि सदियों से अलग-थलग रहे आम भारतीय स्त्री-पुरुषों के बीच हमने पहली बार एक सहज, नया और लोकतांत्रिक साहचर्य बनते देखा। पर एक सार्वजनिक और महान राष्ट्रीय उद्देश्य तले मिलने पर युवाओं के बीच परस्पर मन व विचार साझी करने, टटोलने की प्रक्रिया कितनी गंभीर बननी चाहिए, इस पर हमने अब तक विचार कम किया है। यह भी हम कम ही देख सके हैं कि नेता हों या आंदोलनकारी, नए लोकतांत्रिक रिश्तों की सघनता समय और लगातार संपर्क द्वारा धीरे-धीरे ही बनेगी, मीडिया या संसद में हिस्टीरिया फेंटकर तुरत-फुरत नहीं।
 
इस दौरान कई ज्ञात रिश्तों की शक्ल बदलेगी और नए उभरते ताकतवर गुटों को हिंसा से दबाने की कुचेष्टा भी होगी। मुखर होते दमित वर्गो के खिलाफ घरेलू या सार्वजनिक हिंसा या थानों की बर्बरता तुरंत मिटने वाली नहीं। पर उनसे डरकर लड़कियों को घरकैद देने की बजाय समता और सुरक्षा के दर्जनों तकलीफदेह सवालात पर संसद, सड़क और घरों के भीतर भी एक लंबी, समवेत, गंभीर और ईमानदार जिरह जरूरी है। इससे राज और समाज के किसी भी वर्ग को हम अलग नहीं रख सकते। बुनियादी व टिकाऊ बदलाव एक तकलीफदेह, समावेशी और लंबी लड़ाई से निकलते हैं।
 
 
मृणाल पाण्डे
 
जानी-मानी साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार      
 

आपके विचार
 
 
कोड:
9 + 1

 
Ad Link
विज्ञापन
विज्ञापन
 
 
 
 
Sabse Bada Match Fixer Contest
 
 

बड़ी खबरें

रोचक खबरें

विज्ञापन

बॉलीवुड

जीवन मंत्र

क्रिकेट

बिज़नेस

जोक्स

पसंदीदा खबरें

Email Print Comment
Email Print Comment