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इसके हर पहलू में राजनीति इसलिए ढेर सारे अर्थ

कल्पेश याग्निक | Feb 10, 2013, 09:45AM IST
 
 


प्र. अचानक यह क्या हुआ?

उ. कुछ भी 'अचानक' नहीं हुआ। हां 'अचानक' लगे, ऐसा सबकुछ किया गया। अफज़ल गुरू को फांसी देनी ही थी। केवल समय को लेकर निर्णय करना था। यह कोई विश्लेषण नहीं है। सच है। अजमल कसाब की फांसी को कवर करने वाला दैनिक भास्कर का अंक ही देखें तो शीर्षक था: 'गृहमंत्री ने अब अफजल गुरू की फाइल मंगवाई'


प्र. तो इसे इतना गोपनीय क्यों रखा गया?


उ. फांसी का मामला ही इतना नाज़ुक है। विशेषकर अफजल गुरू की फांसी का। कई पहुलओं से गुप्त रखना न सिर्फ अनिवार्य था वरन् सबसे प्रभावी तरीका भी। एक शब्द की भी भनक लगते ही हंगामा हो सकता था। किसिम-किसिम के हंगामे। शोर वैसे बाद में भी मच सकता है/ मचता ही है। किन्तु 'बाद में कुछ बचता ही नहीं है। कश्मीर में कुछ भड़का है। कुछ ही है लेकिन। खुदकुशी जैसा ही नाजुक है फांसी वाला पल। बस, एक पल टाल दीजिए- फिर खुदकुशी करना नामुमकिन सा है। वैसे ही एक बार टलते ही फांसी देना फिर मुमकिन नहीं। मनासिब भी नहीं समझा जाएगा। सूझबूझ भरी है गोपनीयता। हां, इस बार 'सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री को भी हमने खबर नहीं ही, इतना गुप्त रखा जैसा अजीब बयान नहीं दिया गृहमंत्री ने। परिपक्वता।


प्र. सब-कुछ यानी कसाब जैसा ही है?


उ. जी, नहीं कसाब और अफज़ल को फांसी में सिर्फ 4 बातें एक जैसी हैं : 1. दोनों आतंकी थे 2. दोनों को कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने फांसी पर लटकाया 3. दोनों को सुबह-सुबह अति गुप्त तरीके से सजा दी गई. 4. दोनों की सूचना देशभर में हर आम आदमी को अपने परिचितों को मैनेज कर सुबह 9-9.30 बजे मिली। भले ही कई टीवी चैनलों में सबसे पहले हमने ब्रेक की जैसी होड़ मचा रखी हो। बाकी कसाब और अफजल के केस में जमीन आसमान का फर्क है।


प्र. कसाब-अफज़ल में जमीन-आसमान का फर्क? कौन से फर्क हैं ये?


उ. कसाब सरहद पार से आया था। अफजल हमारी सरजमीं का था। कसाब में जहर भरा गया था। अफजल ज़हर भरता था। कसाब गैर -कानूनी तरीके से घुस कर आया था। अफजल गैर कानूनी तरीके बता रहा था। बना रहा था। कसाब हत्यारा था। हमलावर था। जिस्मानी मौजूदगी थी उसकी। अफज़ल हत्यारों -हमलावरों की साजिश बुन रहा था। मददगार था उसका। दिमागी मौजूदगी थी उसकी। लेकिन सबसे बड़ा और ख़तरनाक फर्क कुछ और था...


प्र. सबसे बड़ा और 'खतनाक' फर्क ?!


उ. वह था माहौल और माहौल बनाने वाले। कसाब को लेकर सिर्फ एकतरफा माहौल बना: वह आतंकी है। इतने घरों को तबाह किया। उसे फांसी दो । जल्दी। अफजल का माहौल एकदम अलग रहा। एक बड़ा वर्ग उसके साथ खड़ा हो गया। उसे एकदम मासूम बताते हुए। कानून को अंधा करार देते हुए। इनमें बड़े बुद्धिजीवी खा़स सेकुलर दानिशवर थे। खूब सुबूत जुटाते। तकऱीर करते। तरकीब लाते। कुछ तरक्की पसंद मशहूर शख्सियतों ने तो बाकायदा किताब लिख दी अफजल के पक्ष में। बाकायदा कै पेन चले। और ठीक उनके उल्टे, देश का बहुत बड़ा वर्ग अफज़ल को सुप्रीम कोर्ट के इंसाफ के हिसाब से फांसी पर न चढ़ाने के लिए सरकार पर चढ़ गया। फांसी में इतनी देर क्यों? सियासत पर बरसने लगा। कांग्रेस और उसकी सरकार अफज़ल के पक्ष में खड़ी हो गई। या कि दिखती तो वैसी ही रही। क्योंकि वह पूरे 8 साल तक इस फांसी को टालती रही।

प्र. कांग्रेस और उसकी सरकार से इसे इतने ल बे समय तक टाला क्यों?


उ. राजनीतिक नेतृत्व जो कुछ भी करता है - साफ-साफ राजनीतिक फायदे के लिए करता है। कांग्रेस ने इसे पूरी तरह वोटों से जोड़ कर देखा। चूंकि देश का एक प्रभावशाली तबका खुलकर अफजल के पक्ष में खड़ा हो चुका था - इसलिए कांग्रेस के पास बहाना भी था। जिस तरह से उसका पर परागत वोट टूटा, उसकी चिंता बढ़ती गई। चूंकि मामला आतंक का था, संसद पर हमले के षडय़ंत्रकारी का था, इसलिए वह 'माफ़ करने की ग़लती  तो कर नहीं सकती थी। सो उसने गृह मंत्रालय, दिल्ली सरकार, दिल्ली उप राज्यपाल और कश्मीर सराकर के द तरों में मामल और फाइलों को उलझा दिया। राष्ट्रपति के पास रुकवा लिया। फाइल ग़ायब तक रही!  दैनिक भास्कर ने तीन साल पहले (31 मई 2010 के अंक में) एक  महीने तक इस पर खोजपरक- शोधपरक पत्रकारिता कर सिद्ध किया था कि कितनी राजनीति और कितने षडय़ंत्र रचे गए एक मामले में।


प्र. तो उसी कांग्रेस सरकार ने अब फांसी क्यों दे दी?


उ. दोहराना आवश्यक होगा कि राजनीति में काम करने वाले हर काम राजनीतिक दृष्टि, राजनीतिक दूरदृष्टि, राजनीतिक तुष्टि, राजनीतिक संतुष्टि के लिए ही करते हैं/रहेंगे। राजनीति की फितरत ही ऐसी होती है। राजनीतिक जुनून ही कुछ ऐसा होता है। इसकी चाहे जितनी निंदा, आलोचना,भत्र्सना, प्रहार किया जाए, राजनीति जारी ही रहेगी। हर पार्टी हर नेता आज यही कह रहा है। कि इस पर राजनीति न करें - और करता ही जा रहा है। करने दी जानी चाहिए।


प्र. क्या इसे नए राष्ट्रपति और नए गृहमंत्री की हि मत कहा जाए?

उ. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने निश्चित ही तेजी और कानून के राज के प्रति स मान दिखाया है। लेकिन एक सच्चाई देखनी जरूरी है : वह है देश का बदला हुआ माहौल। उसी माहौल को प्रणब मुखर्जी ने पहचान लिया है। और उसकी के अनुरूप फैसले ले रहे हैं। दिल्ली में हुए अमानवीय, नृशंस कांड के बाद जनाक्रोश फांसी और फांसी माफ कर देने के विरुद्ध भी आग की तरह भड़का था। भड़का हुआ है। इसलिए आज राष्ट्रपति किसी फांसी को टाल दें या माफ कर दें - संभव ही नहीं है। देश राष्ट्रपति के विरुद्ध ग़ुस्सा निकालने लगेगा। गृह मंत्रालय या गृहमंत्री का तो खैऱ प्रश्न ही नहीं कि वह किसी की भी फांसी माफ करने का दु:स्साहस करेंगे। इसलिए, इन दोनों को दाद देने वालों को भी इस महत्वपूर्ण माहौल आधारित सच्चाई के संदर्भ में ही उनके फैसले को देखा जाना चाहिए। और इनके मूल में कांग्रेस नेतृत्व है। बगैऱ 10, जनपथ की मर्जी के पत्ता भी नहीं हिलता।

प्र. इस फैसले का चुनावों से संबंध


उ. निश्चित रूप से। इसी वर्ष 7 राज्यों में चुनाव हैं। आतंक के विरुद्ध माहौल बना हुआ है। आतंकियों के विरुद्ध माहौल है। फांसी के पक्ष में माहौल है। ताकतवर दिखने वाले नेता और उनके पक्ष में माहौल बन रहा है।


प्र. तो क्या नरेंद्र मोदी फैक्टर भी इसके पीछे काम कर रहा है?

उ. निश्चित। शहरी और बातचीत करने वाला वर्ग मोदी को 'फैसले लेने वाले एक ताकतवर प्रधानमंत्री के रूप में अभी से देख रहा है। धारणा बनाता है यह वर्ग। इसीलिए फांसी के बाद दिनभर केंद्रीय मंत्री कहते रहे : हम फैसले लेते हैं। लागू करते हैं। गुजरात सरकार जैसा नहीं करते कि 2002 के दंगाइयों पर कोई ठोस कार्रवाई ही नहीं की, सजा नहीं दी!

प्र. 'भगवा आतंक' का अचानक मामला उठाने पर भाजपा का बहिष्कार झे रहे गृहमंत्री इससे राहत पाएंगे अब?


उ. एक अलग और अजीब विश्लेषण है। 'भगवा आतंक' का मामला अब लगता है एक गहरी सोच के अतंर्गत लाया गया था। कहा जा सकता है कि मोह मद अजमल कसाब के बाद मोह मद अफजल गुरू को फांसी देने से पहले एक तरह की 'अग्रिम जमानत'थी। आतंक को रंग देने की कोशिश। भाजपा बहिष्कार करे या गृहमंत्री राहत पाएं - इसमें आम नागरिकों की कतई रूचि नहीं है।


प्र. यानी आतंक के रंग का कोई मामला नहीं है - सरकार दमखम वाले फैसले लेना चाहती है?


उ. रंग का निश्चित मतलब है। कसाब और अफज़ल के बीच भगवा आतंक का मसला उठाना काफी नहीं है। कोई आश्चर्य नहीं कि यही सरकार अब राजीव गांधी के हत्यारों नलिनी वगैरह को भी फांसी दे दे। पंजाब के मु यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह राजौना को फांसी दे दे। इनके नाम, रंग और राज्य अलग-अलग हैं। सराकर और कांग्रेस की राजनीति को सूट करेगा। कांग्रेस दमखम वाले फैसले लेना नहीं चाहती। वह तो ऐसे ताकतवर फैसले लेने वाली दिखना चाहती है।


प्र. देश में हर नागरिक इस फैसले के अलग अर्थ लगा रहा है, इससे भ्रम बढ़ रहा है?


उ. बहुत जरूरी है। सबसे अच्छी बात यही हो रही है। कोई भ्रम नहीं बढ़ रहा। हर भारतीय इसे अपनी तरह से समझ रहा है।

 

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