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एक थी डायन, एक रहेगी डायन

जयप्रकाश चौकसे | Jan 24, 2013, 15:31PM IST
एक थी डायन, एक रहेगी डायन
एकता कपूर और विशाल भारद्वाज की इमरान हाशमी अभिनीत ‘एक थी डायन’ के प्रचार के लिए मीडिया के सामने जादू का तमाशा प्रस्तुत किया गया, जिसकी थीम थी कि डायन कभी मरती नहीं और उसकी शक्ति उसकी चोटी में होती है। चोटी काटते ही वह शक्तिहीन हो जाती है। एकता कपूर ने तो दशकों पहले ही घोषित किया है कि वे टेलीविजन और फिल्म निर्माण में सिर्फ रुपया कमाने के उद्देश्य से कार्य करती हैं। उनके सीरियलों में कुछ महिला पात्र डायन से ज्यादा खतरनाक होते हैं।
 
डायन अवधारणा उनके लिए नई नहीं और विशाल भारद्वाज ने भी ‘मकड़ी’ नामक फिल्म से अपना कॅरिअर प्रारंभ किया था, परंतु वह बच्चों के लिए शिक्षाप्रद फिल्म थी कि भूत, प्रेत, डायन नहीं होते। मात्र एक दशक में उनकी धारणा बदल गई है या वे भी सफलता के लिए बेकरार हैं, क्योंकि उनके सिनेमाई प्रयास विफल रहे हैं और उन्हें बॉक्स ऑफिस पर जितने कत्ल की इजाजत थी, उतका कोटा वे ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ के साथ पूरा कर चुके हैं। इस औघड़ फिल्म उद्योग में आप असफल फिल्मों की कतार लगा दो, परंतु जब तक सितारे आपके साथ काम करने को तैयार हैं, तब तक आपके लिए पैसे का जुगाड़ हो ही जाता है। 
 
एक तरफ जब पूरे देश में महिलाओं के साथ बर्बरता की घटनाएं रुकने का नाम ही नहीं लेतीं, वहीं दूसरी तरफ एकता और विशाल भारद्वाज ‘एक थी डायन’ के प्रदर्शन पूर्व के प्रचार में जुटे हैं। क्या नागरिक निर्माता अपने सामाजिक दायित्व के प्रति इतने लापरवाह होते हैं। हमारे दिमाग में ही महिला के प्रति अनादर का भाव इस तरह जमा हुआ है कि हम ‘डायन’ बनाते हैं? आप फूहड़ हास्य प्रस्तुत करके भी धन कमा रहे हैं। तर्कहीनता और वहशी सनकीपन को आप पुरुषोचित गुण के रूप में स्थापित कर चुके हैं।
 
इस प्रकरण का दूसरा पक्ष यह है कि इस तरह का कचरा जनता देखती है, इसलिए रचा जा रहा है। आम जनता सदियों से झूठ की खुराक पर जीवित है। उनके लिए ‘किस्सा तोता-मैना’, ‘हजार रातें’ जैसी लुगदी रची गई है। भूत-प्रेत की कहानियां शायद मनुष्य प्रजाति के प्रारंभिक चरण से सुनी-सुनाई जा रही हैं। विकृत इतिहास और तर्कहीन किंवदंतियों की खुराक हमेशा ही जारी है। विज्ञानजनित माध्यम सिनेमा ने भी अपने प्रारंभ से ही इस तरह की फिल्में बनानी शुरू कीं। अमेरिका जैसे आधुनिकता के प्रति घोर आग्रह रखने वाले देश ने भी बीसवीं सदी की शुरुआत में ही ‘कैबिनेट ऑफ डॉ कैलिगरी’ से हॉरर अवधारणा को भुनाना शुरू किया है। रक्त पीने वाले ड्रैकुला की रचना भी पश्चिम में हुई है। भूत-प्रेत कहानियों के पितामह एडगर एलन पो भी अमेरिकी हैं।
 
हॉलीवुड ने रक्त पीने वाले ड्रैकुला का महिला संस्करण बनाना शुरू किया। इस तरह की फिल्मों में उन्नत टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया जाता है और परदे पर गजब का प्रभाव जमाया जाता है। पूरब के अधकचरा फिल्मकारों के लिए कथा का सूर्य पश्चिम में उगता है और अपने अंधेरों में कैद लोग भूत-प्रेत से थककर अब महिला के अनादर के लिए डायन बनाते हैं। इस तरह की फिल्मों में नारी देह प्रदर्शन के लिए भी खूब अवसर होते हैं। आजकल डायन को पात्र के रूप में एक सीरियल में भी प्रस्तुत किया जा रहा है। वह हर एपिसोड में दावा करती है कि उसकी बुरी नजर से नायिका को कोई बचा नहीं सकता। सच तो यह है कि दुनिया के तमाम देशों में मध्यकाल में अनेक मासूम औरतों को डायन मानने के भरम में जला दिया जाता था।
 
महान लेखक शरतचंद्र के बचपन में बाल अवस्था में विधवा हुई स्त्री प्रेम में छली जाती है और गांव में नैतिकता के ठेकेदार उसे गांव से बाहर खदेड़ देते हैं तथा उसकी सहायता नहीं की जाए, ऐसा हुक्म जारी होता है। बालक शरत के मन में उसके लिए करुणा है। वह चोरी-छुपे उसे रोटियां देता है, परंतु वह नहीं खाती, क्योंकि उसकी अंतरात्मा में यह बात स्थापित हो गई है कि उसने प्रेम नहीं पाप किया है। नैतिकता के ठेकेदारों ने सारा खेल संस्कार और धर्म के नाम पर ऐसा रचा है कि मासूम भी स्वयं को गुनहगार मानने लगता है। इस अभागन को छलने वाला दंडित नहीं किया जाता। इस तरह का न्याय कभी होता ही नहीं। अत: इस तरह झूठ के गिजा पर रचे गए समाज में डायन फिल्में चलती हैं तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। डायन हमारे सोच में शामिल है, मनुष्य प्रजाति के डीएनए में शामिल है। यह बात गौरतलब है कि मृत्यु के बाद जिस दुनिया की कल्पना की जा रही है, उस दुनिया में भी लिंगभेद कायम है और स्त्री के साथ अन्याय कायम है। डायन नहीं होती, इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि अगर होती तो उसके विकृत रूप को बॉक्स ऑफिस पर भुनाने वालों की खबर ले लेती या आय में अपना हिस्सा तो मांगती।
 
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