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रणबीर व करीना करेंगे फिल्म?

 
Source: Jay Prakash Choksey   |   Last Updated 10:06(10/02/12)
 
 
 
 
आजकल फिल्म पुरस्कार समारोह में बड़े सितारे आपस में चुहलबाजी करते नजर आते हैं। हर समारोह के सैटेलाइट अधिकार महंगे में बिकते हैं। बहरहाल ऐसे ही एक समारोह में शाहरुख खान और रणबीर कपूर एक-दूसरे की टांग खींचने की कोशिश करते हैं। एक प्रहसन में शाहरुख रणबीर से पूछते हैं कि क्या उन्होंने उनकी तरह सभी शिखर नायिकाओं से परदे पर या परदे के परे इश्क लड़ाया है?

रणबीर नाम गिनाते हैं, परंतु शाहरुख की तरह करीना कपूर से वह रोमांस नहीं कर सकते। उलझे से दिखने वाले सवालों के जवाब हमेशा आसान होते हैं- रणबीर और करीना भाई-बहन के रूप में प्रस्तुत हो सकते हैं। कई तरह की कहानियां बनाई जा सकती हैं, परंतु सबसे सरल रास्ता है देव आनंद की 'हरे रामा हरे कृष्णा' को थोड़े आधुनिकीकरण के साथ बनाया जाए।

दरअसल बहन-भाई के रिश्ते पर पांचवें-छठे दशक में अनेक फिल्में बनी हैं और उनमें काम करने के कारण अभिनेत्री नंदा की छवि ही छोटी बहन की हो गई थी, जिसे उन्होंने यश चोपड़ा निर्देशित 'इत्तफाक' में एक कातिल की भूमिका करके तोड़ा था।

गौरतलब है कि विगत पंद्रह-बीस वर्षों में पारंपरिक रिश्तों और त्योहारों को परदे पर प्रस्तुत करने में कमी आ गई है और वैलेंटाइन डे इत्यादि नए त्योहार आ गए हैं। अब फिल्मों में होली, दिवाली के दृश्य भी कम आते हैं। यहां तक कि फिल्मकार करवा चौथ से भी परहेज बरत रहे हैं। अधिकांश फिल्मों का बहुत-सा हिस्सा विदेशों में फिल्माया जाता है। बहरहाल, हाल ही में प्रदर्शित 'अग्निपथ' में नायक अपनी बहन की मध्यकालीन-सी नीलामी के दृश्य में खून की होली खेलता है और करीम लाला को पानी में डुबाकर मार देता है। इस फिल्म के वर्ष 1990 में बने संस्करण में भी बहन का पात्र महत्वपूर्ण था।

दरअसल रिश्तों में भावना का संसार है और फिल्म का खेल इसी पर चलता है। रणबीर और करीना कपूर के साथ फिल्म बनाने पर उनके प्रेमी व प्रेमिका के दो पात्र और मिल जाते हैं। भारतीय सिनेमा अपने प्रारंभिक दौर से ही पौराणिक आख्यानों से कथाएं और प्रेरणा लेता रहा है। श्याम बेनेगल ने महाभारत को औद्योगिक घराने में रखकर 'कलयुग' बनाई थी। दुर्योधन की बहन दुशाला हमेशा से पांडवों और सत्य के पक्ष में रही। महाभारत में कृप-कृपी का प्रसंग भी महत्वपूर्ण है।

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में भाई राहुल गांधी और बहन प्रियंका सक्रिय हैं और इनके आधार पर एक आधुनिक काल्पनिक कथा भी गढ़ी जा सकती है। करीना अपने सौंदर्य के कारण प्रियंका की भूमिका कर सकती हैं। रणबीर कपूर तो प्रकाश झा की फिल्म 'राजनीति' के प्रचार के लिए राहुल गांधी की तरह अंधेरी से दादर लोकल ट्रेन में सफर कर चुके हैं। राजनीति आधारित काल्पनिक फिल्म में बहन भाई की सहायता के लिए चुनाव क्षेत्र में कूदती है और अपार लोकप्रियता के कारण उसकी महत्वाकांक्षा जागती है।

अब एक नया द्वंद्व उभरता है। बहरहाल, पुत्रों को हथियार की तरह पालने वाले समाज में पुत्री को सिर पर लटकती तलवार की तरह मानते हैं। हमारी सारी आधुनिकता सतही है। विदेश में जन्म लेने के बावजूद सोनियाजी इस कदर घोर भारतीय हैं कि उन्होंने भी पुत्र परंपरा का ही निर्वाह किया है। बहरहाल, यह विचारणीय है कि क्या भारतीय सिने दर्शक की तरह भारतीय मतदाता के अवचेतन में भी स्मृतियां निर्णायक भूमिका निभाती हैं? क्या उन्हें प्रियंका में इंदिरा नजर आती हैं या नेहरू की झलक मिलती है?

शायद गांधीजी ने ही इंदिरा को प्रियदर्शिनी कहा था। सामूहिक अवचेतन दो और दो चार नहीं, वरन बाईस भी करता है। यह भी कई लोगों की अवधारणा है कि चुनाव में सुंदर चेहरे प्रभावोत्पादक सिद्ध होते हैं। कुछ मतदाता ऐसा भी सोच सकते हैं कि नीतियां सभी की समान हैं तो फिर नाक-नक्श के आधार पर ही मत दें। बहन-भाई के रिश्ते पर कहानियों की कमी नहीं है और एक कहानी तो उत्तरप्रदेश में घटित होते हम देख रहे हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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