मशहूर फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे कहते हैं कि आलिया भट्ट को देखकर पांचवें दशक की हॉलीवुड सितारा एलिजाबेथ टेलर का स्मरण बरबस हो आता है। कहीं कहीं आभास होता है कि 1995 की ऐश्वर्या रॉय सामने आ गई हैं। वह न केवल सुंदर हैं, वरन अभिनय क्षमता का आभास भी देती हैं। इसी तरह निर्देशक डेविड धवन के सुपुत्र वरुण ने भी प्रतिभा का संकेत दिया है। फिल्म के तीसरे नए चेहरे ने भी संयत काम किया है। इस फिल्म को बनाने का मूल उद्देश्य चालीस पार सितारा शासित उद्योग में नई प्रतिभाओं को प्रस्तुत करने का रहा है। प्राय: नए चेहरों के साथ चार-पांच करोड़ की लागत से फिल्म बनाई जाती है और प्रचार पर दो करोड़ से अधिक खर्च नहीं किया जाता। करण जौहर ने इसे शाहरुख अभिनीत फिल्म की तरह बनाते हुए शूटिंग पर पैंतीस करोड़ खर्च किए हैं और जमकर प्रचार भी किया है। उनके साहस की प्रशंसा करनी होगी। यह बात अलग है कि केवल नेक इरादों और साहस से सार्थक फिल्म नहीं बनती।