आज 'सत्यमेव जयते' में आमिर खान बताएंगे, कौन है आइडियल हसबैंड!

नई दिल्ली.आमिर खान ने अपने शो 'सत्यमेव जयते' में आज महिलाओं की सुरक्षा और घरेलू हिंसा के मसले पर बात की। शो में सबसे पहले मुंबई की स्नेहलता की कहानी सामने आई जिसे उनके पति गंदी गालियां देते थे। बात बात पर हाथ उठा देते थे। एक बार पसंद का चावल नहीं बना तो पति ने जोर का थप्पड़ जड़ दिया। उस वक्त स्नेहलता के हाथ में उनकी छोटी बच्ची थी जो जमीन पर गिर गई। एक बार वह अपने भाई से मिलने गईं तो पति ने भला बुरा कहा। जरा सी बात पर रात रात भर घर से बाहर रखते थे।
आमिर ने इस बारे में कुछ आंकड़े पेश किए। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक देश में 40 फीसदी औरतें घरेलू हिंसा की शिकार हैं। हर दूसरी महिला घरेलू हिंसा की शिकार है। 'युगांतर' की रिपोर्ट के मुताबिक 84 फीसदी महिलाएं किसी न किसी तरह से घरेलू हिंसा की शिकार हैं।
आज उन्होंने दर्शक दीर्घा में सिर्फ मर्दों को बुलाया है। सबसे पहले आमिर ने पूछा कि ऐसी कौन सी जगहे हैं, जहां महिलाएं असुरक्षित हैं?
दर्शकों ने लोकल ट्रेन, रात के वक्त सबवे, कॉल सेंटर्स को महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित बताया।
उसके बाद आमिर ने कहा, 'इसका मतलब यह हुआ कि महिलाएं समाज में पब्लिक प्लेसेस में असुरक्षित हैं। पता करते हैं कि यह बात कितनी सही है। महिला अपने साथ हिंसा होने पर दो जगहें जाती हैं। पुलिस स्टेशन और हॉस्पिटल। पुलिस स्टेशन तो वह कम ही जाती हैं। लेकिन, हॉस्पिटल तो उनको जाना ही पड़ता है।'
बांद्रा के भाभा हॉस्पिटल में उनकी टीम ने पता लगाया कि हॉस्पिटल में आनेवाले टोटल मरीजों में घरेलू हिंसा की शिकार 40 प्रतिशत महिलाएं होती हैं।
रश्मि आनंद के साहस की दास्तान
रश्मि आनंद एक कामयाब लेखिका हैं। वह दिल्ली पुलिस की महिला शाखा केंद्र में घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की काउंसिलिंग करती हैं। आमिर खान के शो में उनके चेहरे पर हंसी थी। लेकिन, उनकी इस खिलखिलाहट के पीछे छुपी है एक साहस की दास्तान।
उन्होंने बताया, 'मां-बाप ने मुझे बड़े नाजों से पाला था। एरेंज मैरेज के बाद शादी को दो दिन के अंदर ही वायलेंस शुरू हो गईं।। पहला हादसा आपका वजूद ले जाता है। लेकिन, पहली बार मेरे हसबैंड बहुत रोए। हसबैंड ने कहा कि उन्होंने बहुत गलत किया। लेकिन वह मुझपर जुल्म करते रहे।'
आमिर ने वॉयलेंस का कारण पूछा तो उन्होंने कहा, 'इसके लिए कोई भी कारण हो सकता है। तैयार नहीं हैं तो थप्पर। गलती से बहस कर लो तो थप्पड़। तीन महीने की प्रेग्नेंसी थी तब फर्स्ट फ्लोर की सीढियों से उन्होंने मुझे फेंका और बच्चा नुकसान हो गया। हर साल कोई न कोई हादसा होता। बेटी जब चार पांच साल की हो गई थीं और मैं इसीलिए उनके साथ जीती रही कि सोचती रही कि बच्चे को लेकर कहां जाउंगी। मुझमें हिम्मत नहीं थी लड़ाई करने की। जब मैंने पति का घर छोड़ा तो पैसे की बहुत तकलीफ थी। मैंने संघर्ष किया और बच्चों को सेट किया।'
रश्मि मानती हैं कि जब दो हाथ कुचलते हैं तो भगवान सहारे के लिए पांच सौ हाथ देते हैं।
आमिर ने पूछा कि समाज में उनके पति की छवि क्या थी?
रश्मि ने बताया कि जब वह पति के साथ बाहर निकलती थीं तो लोग कहते थे कि क्या परफेक्ट कपल है। लेकिन, दरवाजे के पीछे क्या होता है. यह सिर्फ मर्द और औरत जानती हैं।
रश्मि ने सबसे बड़ी बात यह बताई कि पति हिंसा करता है और महिलाएं खुद की जिंदगी बचाने के लिए बच्चों का बहाना बनाकर सहती चली जाती हैं। महिलाएं अपनी इनसिक्युरिटी फीलिंग को बच्चों पर डाल देती हैं। ऐसा उनको नहीं करना चाहिए। वह जिस तरह से दस साल तक सहती रहीं, उस तरह से महिलाएं नहीं सहें। पहली बार जब मर्द हाथ उठाता है तो उसी वक्त उसे रोक देना चाहिए।
इन सब घरेलू हिंसा का बच्चों पर क्या असर पड़ता है?
रश्मि ने कहा कि बच्चा सहम जाता है। बाप से नफरत करना शुरू कर देता है।
एक मामले में ऐसा हुआ कि मां को पिता के हाथों पिटते देख एक बार बेटा पिता को बेल्ट से पीटने लगा। रश्मि का कहना है कि ऐसा नहीं होना चाहिए। मां को प्रोटेक्ट करना चाहिए। वॉयलेंस का इलाज वॉयलेंस से नहीं किया जा सकता। इससे तो यह और बढ़ेगा।
रश्मि की बातों से यह निकल कर सामने आया कि महिलाओं जिन बच्चों की भलाई के लिए पति के घर में हिंसा सहती हैं, उनके भविष्य के लिए कि लिए यह बहुत नुकसानदेह होता है। इसीलिए, अगर बच्चे के जीवन को बहतर बनाना चाहती हैं तो सबसे पहले अपने हिंसक पति का घर छोड़ दें। आमिर ने यही बात दर्शकों को फिर याद दिलाई।
आमिर ने इसके बाद
महिलाओं पर हो रहे हिंसा को एक वैचारिक एंगल दिया। उन्होंने कहा कि स्नेहलता और रश्मि दो अलग-अलग तबकों से थीं और दोनों ही घरेलू हिंसा की शिकार थीं। आंकड़ों के अनुसार हर दो में से एक महिला इस हिंसा की शिकार हैं। ऐसा लग रहा है जैसे समाज में एक जंग छिड़ी हो। मर्दों का तबका, औरतों पर जुल्म ढ़ा रहा है।
आमिर को पतियों ने बताया कि वह अपनी पत्नियों को क्यूं मारते हैं?
- सुबह को समय पर खाना नहीं मिलेगा तो औरत को मारूंगा नहीं तो क्या करूंगा।
-पति की इज्जत ना करे, तो वह मार खाती ही है।
-पत्नी को मारता हूं और पान खिला देता हूं। महीने में दो बार थप्पड़ मारता हूं।
-जो चीज नहीं करनी को कहो, वह करती है तो उसे मारता हूं।
- पेट में बात नहीं पचा पाती तो मार तो खाएगी ही।
मर्दों को क्यूं लगता है कि औरतों पर वह हाथ उठा सकते हैं? कमला भसीन 42 साल से घरेलू हिंसा को रोकने के लिए संगत संस्थान के माध्यम से जुटी हैं। उनसे आमिर ने किया सवाल-जवाब-
यह मानसिकता कहां से आती हैं?
इसके पीछे पितृसत्तात्मक सोच है, जिसमें मर्दों को बेहतर और औरतों को बदतर समझा जाता है। कोई मर्द अपने सीनियर और बॉस पर नहीं उठता। जो कमजोर है, उसपर हाथ उठता है।
परंपराएं- बचपन से लड़कियों को ऐसी परंपराओं में बांधा जाता है जिसमें यह बताया जाता है मर्द औरत की रक्षा के लिए है। जैसे कि रक्षा-बंधन, करवा चौथ का त्योहार।
भाषा- 'पति' शब्द का मतलब होता है मालिक, स्वामी। जब पति स्वामी है तो पत्नी दासी कहलाएगी। हमारी जबान में और कोई शब्द है ही नहीं। मालिक तो अपने दास को मारेगा ही।
तो इस मानसिकता को कैसे बदला जाता है?
जहां तक औरतों की सोच बदलने की बात है, पंद्रह बीस साल से इसपर काम करने के बाद मेरा अनुभव है कि अब मर्दों को बदलना होगा? मारता कौन है? मर्द। वॉयलेंट होना जिस्मानी चीज नहीं है। अगर ऐसा होता तो दुनिया में बुद्ध और गांधी नहीं होते। वो साठ प्रतिशत मर्द कैसे होते, जो अपनी बीवियों को नहीं मारते।
मर्दों को सिखाया जाता है कि उनको रोना नहीं है। मां मर जाती है, लेकिन मर्द नहीं रोते। उनको लगता है कि यह उनकी मर्दानगी के खिलाफ है। मर्द अपनी कमजोरी का बयान नहीं करते। पितृसत्ता मर्दों से उनकी इंसानियत छीन रही है।
मर्द जब मारते हैं तो औरतें क्यूं सहती हैं?
दरअसल, मर्द जिस समाज में रहते हैं, उसी मानसिकता के समाज में औरतें भी रहती हैं। दोनों एक ही कुएं का पानी पीते हैं। हमारे मजहब, परंपरा और संस्कृति यही सिखाती है। दोष पितृसत्तात्मक सोच का है। इसीलिए, अधिकतर औरतें चुपचाप सह लेती हैं।
यह हर तबके की औरतें हिंसा की शिकार होती हैं?
मिड्ल क्लास की औरतों में यह ज्यादा है। आदिवासियों में और कामकाजी महिलाओं में यह कम है क्योंकि वह मार खाने पर चिल्लाने लगती हैं।
बहुत सी औरतें सोचती हैं कि पति प्यार करता है, इसीलिए मारता है?
तब तो इसका मतलब यह हुआ कि महिलाएं अगर अपने पति को प्यार करती हैं तो दिन-रात उसको मारना-पीटना चाहिए। (आमिर और कमला जी के साथ दर्शक हंस पड़ते हैं।)
पति कहता है कि वह बाहर कामकर पैसा कमाता है, थक जाता है और जब घर आता है तो फ्रस्ट्रेशन के कारण पत्नी पर हाथ उठ जाता है?
इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन की रिसर्च से पता चलता है कि औरतें मर्दों से पांच-सात घंटे ज्यादा काम करती हैं। इसके अलावा वह बच्चे पैदा करती हैं। फिर यह कहना सही नहीं है। पति पैसा कमाता है लेकिन बच्चे पैसे तो खाएंगे नहीं, पैसे पर सोएंगे नहीं। पत्नी उस पैसे से खाना बनाती है, बिस्तर बनाती है। मर्द और औरत मिलकर काम करते हैं तब जाकर परिवार चलता है।
औरत की मेहनत मर्दों को अगले दिन काम पर जाने लायक बनाती है। वर्कप्लेस से मर्द पिटके, बेइज्जत होकर आते हैं तो औरत उसके टूटे हुए अहम को फिर से खड़ा करेगी। रात को मन बहलाएगी। सुबह को नाश्ता देगी, जूते चमकाएगी। उसके बाद एक्जेक्यूटिव या मजदूर तरोताजा होकर नौकरी पर जाएगा।







