केरल में बंदर तोड़ेंगे नारियल!

तिरुवनंतपुरम।केरल में श्रमिकों की कमी के कारण अब बंदरों को पेड़ों से नारियल तोड़ने के लिए प्रशिक्षित करने की योजना है।
पेड़ों पर चढ़कर नारियल तोड़ना खतरनाक होने के साथ श्रम साध्य कार्य है। नारियल तोड़ने वाले श्रमिकों में कमी का प्रभाव राज्य के नारिलय व्यवसाय पर पड़ा है। कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि फलों की आपूर्ति बनाए रखने के लिए सर्वोत्तम विकल्प के तौर पर बंदरों को प्रशिक्षित करना सामने आया है।
राज्य के कृषि विभाग के उपनिदेशक के.आर. विजयकुमार ने बताया, "केरल के लोगों का पारम्परिक जीवन एवं जीविका नारियल पर टिकी है। पेढ़ पर चढ़ने वालों की संख्या में कमी के चलते यह व्यवसाय प्रभावित हुआ है।"
उन्होंने बताया, "इसलिए हमने नारियल तोड़ने के लिए बंदरों को प्रशिक्षित करने के विषय में प्रस्ताव रखा। ये मनुष्यों से बढ़िया कार्य कर सकते हैं। थाईलैंड, इंडोनेशिया एवं श्रीलंका में पहले से ही बंदरों को नारियल तोड़ने के कार्य में लगाया गया है।"
लेकिन इस योजना का क्रियान्वयन करने पर पशु अधिकारों के रक्षक विरोध कर सकते हैं। विजयकुमार ने कहा, "पशुता क्रूरता अधिनियम के तहत पशु प्रेमी इस कदम का विरोध कर सकते हैं।"
उन्होंने कहा कि वैसे तो हाथियों का लकड़ी की ढुलाई में एवं बैलों का खेत की जुताई में पहले से प्रयोग होता आ रहा है।
कोच्चि स्थित नारियल विकास बोर्ड के अनुसार केरल में डेढ़ करोड़ नारियल के पेड़ हैं और फल तोड़ने के लिए 40,000 लोगों की जरूरत है। राज्य में साक्षरता दर एवं खाड़ी देशों की तरफ बढ़ने से पेड़ पर चढ़ने वाले लोगों की कमी हो गई है।
उन्होंने कहा, "एक प्रशिक्षित बंदर एक दिन में करीब नारियल के 500 पेड़ों पर चढ़ सकता है। जबकि मनुष्य एक दिन में 10 से ज्यादा पेड़ों पर नहीं चढ़ सकता।"उन्होंने बताया कि बंदरों के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की जाएगी जहां इंडोनेशिया और थाइलैंड प्रशिक्षक आएंगे।
लेकिन विजयकुमार की राय से नारियल विकास बोर्ड के एक सदस्य ने असहमति जताते हुए कहा, "नारियल के पेड़ से प्रत्येक 45 दिन पर 60 फल पैदा होते है। इस पर हमेशा फूल रहता है। कौन सा फल तोड़ने लायक है या नहीं, इसका निर्धारण बंदर नहीं कर सकता।"
सदस्य ने बंदरों की जगह रोबोट के प्रयोग की वकालत की लेकिन कृषि विभाग के सदस्य ने प्रतिवाद करते हुए कहा कि बोर्ड ने रोबोट का प्रयोग किया था, लेकिन वह सफल नहीं हुआ।





