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...जब अमिताभ के इस फैसले से चौंक उठी थीं रेखा !

शरद ठाकर | Jun 14, 2012, 01:51AM IST
 
 


जीवन में ऐसा अक्सर होता है कि किसी व्यक्ति से पहली मुलाकात में ही हमें उससे लगाव हो जाता है। इसमें अगर पुरुष-पुरुष या स्त्री-स्त्री हों तो मन में मित्रता की भावना और अगर दोनों पात्र विजातीय हों तो प्रेम का भाव उत्पन्न हो जाता है। कुछ ऐसा नफरत के बारे में भी कहा जा सकता है। अगर पहली ही मुलाकात में हमें किसी से नफरत हो जाए तो दूसरी बार उससे मिलने का मन भी नहीं होता।

 

आखिर ऐसा क्यों होता होगा??? क्या इसमें प्रकृति की विषमता मुख्य भूमिका निभाती हैं? या फिर दोनों के शरीरों से उठती अदृश्य तरंगें आकषर्ण या विकर्षण के लिए जवाबदेह होती हैं? पिछले जन्म का बंधन या ऋणानुबंध इसका कारणभूत होता है? ग्रहों का प्रभाव, वातावरण का असर या फिर संयोग?

 

अगर उक्त कारणों में से कोई भी नहीं तो अब तो एक ही परिबल बाकी रह जाता है...क्या इसके पीछे जन्म की राशि का असर हो सकता है?

 

खैर, अमिताभ-रेखा के संबंधों के बारे में तो खुद रेखा यह मानती हैं कि उनके रिश्तों के लिए दोनों राशि जवाबदेह है। रेखा की जन्मतिथि 10 अक्टूबर (10.10) है, जबकि अमिताभ की जन्मतिथि 11 अक्टूबर (11.10) है। यानी की दोनों की राशि तुला है। दोनों की प्रकृति एक समान है, गुण-प्रतिभा भी एक समान ही है। दोनों को फूल पसंद हैं। इसीलिए तो रेखा, अमिताभ के जन्मदिवस पर हमेशा उन्हें ‘बुके’ ही दिया करती हैं। हालांकि रेखा की तरह बेबाकी अमिताभ में नहीं है, वे अक्सर इस बारे में मौन धारण कर लेते हैं।

 

रेखा और अमिताभ सरेआम एक-दूसरे को उनके नाम से भी नहीं बुलाते। नो अमितजी, नो रेखाजी। बात अगर अमिताभ की की जाए तो भीड़ मंे रेखा को पुकारने के लिए एक ही शब्द कहते हैं.‘एक्सक्यूज मी!’ यह शब्द रेखा हजार लोगों की भीड़ में भी स्पष्ट सुन लेती हैं और उनकी आंखे उनके प्रियपात्र के शब्दों का पीछा करते-करते उन तक पहुंच जाती हैं।

 

दूसरी तरफ जब रेखा को अमिताभ से बात करनी हो तो वे उनके लिए सिर्फ ‘आप’ शब्द का प्रयोग करती हैं। यहां तक कि अमिताभ की अनुपस्थिति में भी रेखा अमिताभ का नाम लेते हुए दिखाई नहीं देतीं। वे अमिताभ के नाम के बदले उनके सर्वनाम का ही उपयोग करती हैं।

 

एक बार की बात है एक फिल्म दृश्य के लिए निर्देशक ने रेखा को काफी छोटे व तंग कपड़े पहनने को कहा। हालांकि इससे पहले रेखा परदे पर कई बार इस तरह के कपड़ों में दिखाई दे चुकी थीं, लेकिन यह समय उनके प्रेमकाल का था।

 

अब समय बदल चुका था, रेखा ने अश्लील कपड़े पहनने से स्पष्ट मना कर दिया। कॉस्ट्यूम डिजायनर ने जब उनसे इसका कारण पूछा तो जवाब देते समय रेखा के चेहरे पर लज्जा स्पष्ट नजर आई और उनके मुंह से ये शब्द निकले..‘अगर मैं ऐसे कपड़े पहनूंगी तो उनको अच्छा नहीं लगेगा।’

 

यह एक उल्लेखनीय किस्सा है और इसका जवाब भी उल्लेखनीय है। हुआ भी सबकुछ डंके की चोट पर तो इसलिए लोग इसके बारे में जान सकते हैं। एक समय था, जब अमिताभ और रेखा महीने के आधे दिन एक-दूसरे के साथ ही गुजारा करते थे। फिल्म की शूटिंग के अलावा भी ये साथ ही दिखाई दिया करते थे। एक-दूसरे से मिलने के बहाने खोजा करते थे। दोनों ने कई प्रसिद्ध फिल्मों जैसे - नमक हराम, दो अंजाने, ईमान-धरम, राम बलराम, सिलसिला में साथ ही काम भी किया। 1973 से शुरू हुआ यह सिलसिला 1981 मे आई ‘सिलसिला’ फिल्म के साथ ही खत्म हो गया।

 

यह वह समय था, जब भारतीय फिल्म जगत में अमिताभ के नाम का डंका बजा करता था। अमिताभ का नाम अब तक सफलता का पर्याय बन चुका था। इस समय अगर अमिताभ को छींक भी आ जाए तो पूरी फिल्म इंडस्ट्री को जुकाम हो जाया करता था। उनके इशारे पर खलनायक, हास्य-कलाकार और चरित्र अभिनेता की फिल्मों में एंट्री या छुट्टी हो जाया करती थी और उनकी एक छोटी सी मुस्कान पर भी फिल्म के लिए नई हीरोइन पसंद कर ली जाती थी।

 

यह वह समय था, जब रेखा और अमिताभ पूरा समय एक-दूसरे के साथ ही बिताया करते थे। यह वह समय था जब इतने तीव्र स्तर के प्यार भरे पलों में भी दोनों के बीच झगड़े की बात तो दूर, एक बार भी हल्की नोंक-झांेक भी न हुआ करती थी।

 

आमतौर पर प्रेमी-प्रेमिका के बीच छोटे-मोटे मीठे झगड़े होते ही रहते हैं। (पति-पत्नी के बीच तो ज्यादातर झगड़े ही हुआ करते हैं।) रूठना, मनाना, फरियाद करना, खुलासे करना, दलीलें देना.. प्रेम के अविभाज्य खंड हैं। मानों खाने में मिलाया जाने वाला नमक हैं और इसी से तो संबंधों में स्वाद पनपता है।

 

लेकिन रेखा का स्वभाव एक अलग ही स्तर का था। रेखा ने कभी अमिताभ से लड़ाई-झगड़े, वाद-विवाद, सवाल-जवाब, आरोप-प्रत्यारोप, खुलासे या फरियाद की स्थिति नहीं बनने दी।

 

वह सिर्फ एक ही बार अमिताभ से नाराज हो गई थीं और बहुत नाराज, और बहुत नाराज होती भी क्यों नहीं, पहली बार जो हुई थीं। यह कारण भी निजी नहीं, बल्कि सार्वजनिक था।

 

सन् 1984 में देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी। रातों-रात उनके पुत्र स्वर्गीय राजीव गांधी को विमान के कॉकपिट से उठाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन कर दिया गया था। राजीव इस समय बहुत व्यथित थे, उन्हें इस समय एक विश्वासपात्र मित्र की आवश्यकता थी..

 

एपिसोड जारी है.. अंतिम भाग पढ़ें सोमवार (18 जून) को।

 

 

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