प्रिय शिष्या ही बनी कम्यून टूटने का कारण
ओशो ने अपनी शिष्या शीला को कुछ सीमित अटार्नी पावर दे दिए। 1993 में शीला ने घोषणा की कि ओशो सिर्फ उसी से ही बात करेंगे। वह आश्रम की हर गतिविधि को नियंत्रित करना और चलाना चाहती थी। इसके चलते शीला के प्रति आश्रम में रहने वालों भक्तों का असंतोष बढ़ता चला गया। उसने यह भी घोषणा कर दी कि ओशो का सही मायने में वही प्रतिनिधित्व करती है। इससे नाराज बहुत से शिष्य ओरेगन के आश्रम को छोड़कर चले गए। रजनीशपुरम में आए बहुत से विदेशी भक्तों को वीजा संबंधी जटिलताओं को लेकर परेशान होना पड़ा और कुछ ने इससे निजात पाने के लिए यहीं पर विवाह भी कर लिए।