कुछ क्षणों तक उन्होंने मुझे अपने सीने से लगाए रखा। मुझे एक अद्भुत व अनंत आनंद का अनुभव हुआ। इसके बाद उन्होंने आहिस्ते-आहिस्ते से मुझे छोड़ा और मेरा हाथ पकड़ लिया। मेरे सिर को अपनी गोद में रखा। इसके बाद उन्होंने मेरे पिता से बातचीत शुरू की, लेकिन मैं उन्हीं में खोई हुई थी। मैं वहां होने पर भी न होने जैसा अनुभव कर रही थी।
ओशो ने कहा, ‘शीला, तुम मुझसे कल दोपहर में 2.30 बजे मिलने आओगी।'