संन्यासियों का शोषण
शीला ने अपनी किताब में लिखा है कि ओशो एक अद्भुत बिजनेसमैन थे। उन्हें अपने प्रोडक्ट, उसकी कीमत और मार्केट की अच्छी जानकारी थी। वे आश्रम को इस तरह चलाना चाहते थे, जिससे तमाम खर्च रिकवर हो जाएं। इसी के चलते आश्रम में प्रवेश के लिए फीस भी वसूली जाती थी। उनके थेरेपिस्ट ग्रुप भी आश्रम में थेरेपी के लिए पैसे लिया करता था। आश्रम में आने वाले लोगों को उनका मनपसंद भोजन मुहैया करवाया जाता था और इसके लिए भरपूर पैसा वसूला जाता था। आश्रम में आने वाले लोगों से एंट्री फी, ग्रुप एंट्री फी सहित पैसे कमाने के कई विकल्प मौजूद थे, जिससे कुछ ही समय में पानी की तरह पैसा आने लगा।
उनके आश्रम में थेरेपी का एक प्रमुख भाग सेक्स था। यहां कामुकता किसी भी निर्णय के बगैर स्वीकार्य थी। सेक्स के संबंध में माना जाता था कि इसका नैतिकता से संबंध नहीं। ओशो चाहते थे कि युगल किसी भी चिंता के बगैर संभोग करे। धीरे-धीरे आश्रम में सेक्स चरम पर पहुंच गया। कई बार तो अति उत्साह और बौद्धिकता की सीढ़ी जल्दी चढ़ने के चक्कर में गई ग्रुपों के बीच हिंसा भी हो जाया करती थी।