निहारते ही रह जाएंगे राजकोट के इस अजेय किले की भव्यता

राजकोट। वर्षो पूर्व रजवाड़ों-नवाबों ने सौराष्ट्र (गुजरात) की धरती पर अनेक भव्य महलों का निर्माण करवाया। अद्भुत सौंदर्य कला से पूर्ण इन महलों की भव्यता आज भी बरकरार है। सौराष्ट्र के राजकोट शहर से लगभग 14 किमी की दूरी पर स्थित एक ऐसा ही एक किला है। इस किले को खीरसरा पैलेस के नाम से जाना जाता है।
इतिहासकारों की मानें तो इस किले का निर्माण गौरी-बादशाह के शासनकाल में हुआ था। इसके बाद ठाकोर साहब की सातवीं पीढ़ी यानी की ठाकोर रणमलजी ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था। आज भी इस किले की भव्यता देश ही नहीं, बल्कि विदेशी पर्यटको ंको भी अपनी ओर खींचती है। अगर आप गुजरात के राजकोट शहर आएं तो कुछ ही दूरी पर स्थित इस किले के दीदार करना न भूलें।
खीरसरा पैलेस की खासियत :
राजकोट शहर से 14 किमी की दूर कालावाड रोड पर स्थित छोटी धारा और टेकरियों के बीच काले पत्थर की टेकरी पर निर्माणित यह किला लगभग 7 एकड़ भू-भाग में फैला हुआ है। आउटरलुक और इंटीरियर इतना सुंदर और अद्भुत है कि इसे आप निहारते ही रह जाएंगे। किले की इसी भव्यता और सुंदरता के चलते बॉलीवुड की कई फिल्मों की यहां शूटिंग हो चुकी है।
महल का इतिहास :
इतिहासकारों के अनुसार इस किले का निर्माण गौरी-बादशाह के शासनकाल में हुआ था। हालांकि इसका लिखित इतिहास, इतिहास के पन्नों में ही कहीं दबकर रह गया है। लेकिन इसकी जानकारी जरूर मिलती है कि ठाकोर साहब की सातवीं पीढ़ी यानी की ठाकोर रणमलजी ने इस किले के जीर्णोद्धार के साथ ऐसी व्यूह रचना करवाई की फिर यह किला किसी भी शासक द्वारा जीता नहीं जा सका।
बताते हैं कि किले के जीर्णोद्धार के समय यहां पर एक पीर बाबा आए थे। रणमलजी उनके पास गए और इस महल के बारे में उनसे बात की। पीर बाबा ने रणमलजी को यहां एक भूलभुलैया बनाने की बात कही। रणमलजी ने उनकी बात मान ली और महल के अंदर एक ऐसी भूलभुलैया का निर्माण करवाया, जिसमें लगभग 400 व्यक्ति अदृश्य रूप से रह सकते थे। युद्ध के समय इस भूलभुलैया ने कई बार हारी हुई बाजी पलट कर रख दी। क्योंकि किले में दाखिल शत्रु सेनाएं इसमें गुम हो जाती थीं, जिसका फायदा यहां छिपे सैनिक उठाते हुए शत्रुआंे को नेस्तानाबूद कर दिया करते थे। कहा जाता है कि इसी भूलभुलैया की वजह से यह किला अजेय रहा।
रणमलजी के शासन काल ही एक बात है। इस किले की जबर्दस्त व्यूह रचना से जूनागढ़ का एक नवाब चिढ़ गया। उसने इस किले को जीनते का निश्चय किया। लेकिन इससे पहले ही रणमलजी ने आक्रमण कर जूनागढ़ के दो गांवों को अपने कब्जे में ले लिया। इस बात से नवाब को इतना गुस्सा आया कि उसने इस महल को ही नेस्तानाबूद करने का मन बन लिया और तोपें लेकर विशाल सेना सहित यहां पहुंच गया। लेकिन नवाब की तोपों के कई गोले भी इस किले की मजबूत संरचना को डिगा नहीं सके। इसके बाद नवाब ने सेना को महल में प्रवेश करने का हुक्म सुनाया।
इसी बात से घबराए रणमलजी ने फिर पीर बाबा से सलाह मांगी। पीर बाबा ने महल के अंदर ही ऐसी व्यूह रचना करवा दी कि आखिरकार नवाब को बुरी तरह पराजित होकर भागने पर मजबूर होना पड़ा। आज भी नवाब की दो तोपें महल में विजय स्मारक के रूप में रखी हुई हैं। रणमलजी की मृत्यु के बाद ठाकुर सुरसिहंजी ने इस किले की हिफाजत की।
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