अहमदाबाद। मोदी सरकार को एक ओर झटका देते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने बुधवार को 2002 के दंगों में धार्मिक स्थलों को हुए नुकसान का मुआवजा देने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने कहा है की 2002 में गोधराकांड के बाद राज्य भर में हुए दंगों को रोकने में राज्य सरकार और उसका गुप्तचर तंत्र असफल रहा था। इस वजह से व्यवसायिक ठिकानों के अलावा धार्मिक स्थलों को भी काफी नुकसान पहुंचा था।
प्रशासन की असफलता के चलते धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचा था। इसलिए उन्हें मुआवजा देना राज्य सरकार की जिम्मदारी बनती है। यह आदेश देते हुए गुजरात हाईकोर्ट के कार्यकारी चीफ जस्टिस भास्कर भट्टाचार्य व जस्टिस जे.बी. पारडीवाला की बेंच ने 2002 के दंगो में नुकसानग्रस्त हुए करीब 572 धार्मिक स्थलों के प्रशासनाधिकारियों को मुआवजा देने का बुधवार को आदेश दिया है।
इस्लामिक रिलीफ कमिटि, अहमदाबाद की जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान गुजरात सरकार को फटकार लगाते हुए हाईकोर्ट की बेन्च ने कहा कि धार्मिक स्थलों को मुआवजा देना सरकार की नीति में नहीं आता और प्राकृतिक आपत्तियों में भी धार्मिक स्थलों को मुआवजा नहीं दिया गया, सरकार की ऐसी दलील को स्वीकारा नहीं जा सकता। क्योंकि दंगे लंबे समय तक चले थे और उसे रोकने में सरकार असफल रही थी।
संविधान के आर्टिकल 24 के मुताबिक सरकार धर्म के प्रचार व प्रसार के लिए पैसा नहीं खर्च कर सकती, लेकिन अगर प्रशासन कानुन-व्यवस्था बरकार रखने में असफल रहता है और धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचता है ऐसी स्थिति में संविधान के मुताबिक जनता के मुलभूत अधिकारों का हनन गिना जाएगा। ऐसी स्थिति में सरकार को मुआवजा देना होगा।
इस केस में याचिकाकर्ता कमिटी ने सीनियर एडवोकेट युसुफ मुछाला, एडवोकेट एम.ए. खराडी और एडवोकेट एम.टी.एम हकीम की ओर से 2003 में एक जनहित याचिका के तहत दंगो के दौरान निशाना बनाई गई मस्जिदें, दरगाहें, मदरसे और कुछ मंदिरों के प्रशासनाधिकरियों को मुआवजा देने के मांग की थी।
मुआवजा देने के लिए हाईकोर्ट की स्कीम
1. सभी जिलों के प्रिन्सिपल जज मुआवजा तय करने में स्पेशिल ऑफिसर की भूमिका में रहेंगे। 2. धार्मिक स्थलों के ट्रस्टी व प्रशासनाधिकारियों के दो माह के अंदर इनके समक्ष याचिका पेश करनी होगी। 3. इस याचिका के तहत राज्य सरकार याचिकाकर्ता की मांग वाजिब है या नहीं व कितना मुआवजा दिया जा सकता है इस बारे में अपना जवाब पेश करेगी। 4. प्रिन्सिपल जज अर्जियों की जांच कर उन्हें मुआवजा देने का अंतिम निर्णय करेंगे। 5. उनके फैसले को 15 दिनों के अंदर हाईकोर्ट में भेजना रहेगा। 6. फाईनल रिपोर्ट के बाद 6 माह के अंदर अरजी की सुनावई कर देनी होगी।
सरकार को हाईकोर्ट की फटकार
- अगर मुआवजा नहीं दिया गया तो धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाने की प्रेरणा मिलेगी।
- दंगे लंबे दिनों तक चले थे और उस पर काबू पाने में सरकारी तंत्र असफल रहा था।
- अगर सरकार निवास स्थान और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को मुआवजा देने की नीति बनाती है तो धार्मिक स्थलों को क्यों नहीं दिया जाता?
- प्राकृतिक आपत्ति में भी धार्मिक स्थलों को मुआवजा नहीं दिया जाता ऐसी सरकारी दलील को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
- संविधान के मुताबिक जनता के मुलभूत अधिकारों का हनन हुआ है।
- अगर नीति न होने की वजह से मुआवजा नहीं देने की दलील का स्वीकार किया जाता है तो असामाजिक तत्वों को धार्मिक स्थलों को नुकसान पहोंचाने की प्रेरणा मिलेगी।
करीब 572 धार्मिक स्थलों को मुआवजा मिलने की संभावना
इस केस में याचिकाकर्ता इस्लामिक रिलीफ कमिटी की ओर से पेश किए गये आंकड़ों के मुताबिक दंगों के दौरान पूरे राज्य में 274 मस्जिद, 167 दरगाह और 131 अन्य धार्मिक स्थलों को मिलाकर कुल 572 धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाया गया या तो लूटा गया है या नष्ट किया गया है। हाईकोर्ट के इस फैसले से इन सभी धार्मिक स्थलों को मुआवजा मिलने की संभावना है।
मानव अधिकार पंच का रिपोर्ट विधानसभा में क्यों नहीं रखा गया?
हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय मानव अधिकार आयोग ने एक रिपोर्ट तैयार कर धार्मिक स्थलों को मुआवजा दिया जाना चाहिए ऐसा प्रस्ताव दिया था। साथ ही उसने इस रिपोर्ट को विधानसभा में प्रस्तुत करने का भी प्रस्ताव दिया था। लेकिन सरकार ने यह रिपोर्ट विधानसभा में प्रस्तुत नहीं की। आयोग का यह प्रस्ताव विधानसभा में क्यों नहीं रखा गया, इस बारे में सरकार का स्पष्टीकरण संतोषजनक न होना हाईकोर्ट ने बताया है।
एसआईटी रिपोर्ट में मोदी के खिलाफ सबूत नहीं
सोहराबुद्दीन एनकाउंटर : जांच के लिए लेंगे...
दंगों के समय मोदी ने कभी शांति की अपील नहीं की :...