जिसका इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं उसका ज्ञान व्यर्थ है-
जैसे समुद्र में गिरी हुई वस्तु नष्ट हो जाती है उसी तरह दूसरे की अनुसनी करने वाले को कही गयी उचित बात भी व्यर्थ हो जाती है। जिस मनुष्य ने अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं कर दिखाया उसका शास्त्र ज्ञान भी उसी तरह व्यर्थ है जैसे राख में किया गया हवन।