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एक शिक्षक का दर्द: जेबीटी भर्ती घोटाले ने चार साल तक भटकाया

bhaskar news | Jan 18, 2013, 06:58AM IST
 
 


अम्बाला सिटी. 1999 में 3206 जेबीटी की भर्ती का विज्ञापन देखकर मैंने आवेदन किया। कुछ महीनों के बाद रिजल्ट की सूची जिला प्राइमरी कार्यालय में लगी। मैं कार्यालय पहुंचा। सूची में अपना रोल नंबर 4004 के सामने मेरिट नंबर 1938 पढ़कर खुशी से झूम उठा।

सरकारी नौकरी लगने की चाह में उसी दिन प्राइवेट स्कूल में एक हजार महीने वाली शिक्षक की नौकरी छोड़ दी। दस दिन के बाद जब मैं जिला प्राइमरी कार्यालय में नियुक्ति पत्र लेने गया तो डीलिंग क्लर्क का जवाब था कि आपका नाम वेटिंग लिस्ट में है। यह सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।

बाहर आकर सूची को दोबारा देखा। अबकी बार नई सूची लगी थी।  उसमें मेरे नाम की जगह किसी और का नाम लिखा था। मेरे सहित चार अन्य का नाम भी प्रतीक्षा सूची में दिखाया गया। मायूस होकर घर लौट आया। पुरानी नौकरी भी हाथ से जा चुकी थी।


कुछ दिनों के बाद करनाल से एक लड़का आया। उसने बताया कि भर्ती में भाई-भतीजावाद हुआ है। मैंने हाइकोर्ट की शरण ली। डायरेक्टर प्राइमरी एजुकेशन हरियाणा को कटघरे में खड़ा किया। तत्कालीन डायरेक्टर अरुण कुमार की ओर से एक पत्र 14 जनवरी 2003 को मिला। उसमें उन्होंने माना कि आप नौकरी के लिए योग्य हैं। मैं डायरेक्टर के आदेशों की प्रति लेकर पंचकूला गया। वहां  नियुक्ति पत्र मांगा।


हेडक्वार्टर के डीलिंग क्लर्क ने कहा कि आपका मामला कोर्ट में विचाराधीन है। जब तक कोर्ट का फैसला नहीं आता, तब तक नियुक्ति पत्र नहीं मिलेगा। कोर्ट ने 8 दिसंबर 2003 को अपने फैसले में कहा कि चार महीने में प्राइमरी एजुकेशन डायरेक्टर याची के पक्ष में को निर्णय लें। फिर भी मुझे नियुक्ति पत्र नहीं मिला।

12 मई 2004 को तत्कालीन प्राइमरी शिक्षा निदेशक पीसी बिंदहान का एक पत्र मिला। निदेशक ने आईएएस संजीव कुमार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने का हवाला दिया। साथ ही कहा कि हमारे पास दो रिकार्ड हैं। एक असली है और एक नकली। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी है।

अत: केस की जांच जब तक पूरी नहीं हो जाती तब तक हम आपको नियुक्ति पत्र नहीं दे सकते। मैंने सीबीआई जांच की रिपोर्ट के इंतजार में चार साल बेरोजगारी में बिताए। कई प्रयासों के बाद मुझे जिला परिषद के अधीन जुलाई 2004 में जेबीटी की नौकरी दोबारा मिल पाई।


प्राइमरी निदेशक ने भी योग्य माना था
मेरे पिता योगराज शर्मा सेना में सूबेदार थे। लिहाजा मैंने भूतपूर्व सैनिक के आश्रित (डीईएसएम) कोटे से आवेदन किया था। चयन न होने पर जब मैंने कोर्ट में चुनौती दी तब प्राइमरी निदेशक अरुण कुमार के कार्यालय से पत्र आया था। इसमें कहा गया था कि मेरे स्थान पर सुनील कुमार ने नियुक्तिपाई।

उसके अंक ४८.४३फीसदी थे जबकि मेरे ५४.५७ फीसदी थे। सुनील ने भी डीईएसएम कोटे से आवेदन किया था। लेकिन दूसरी लिस्ट में उसे एक्स सर्विसमैन कोटे से चुन लिया गया था।

 

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