डबवाली. देश के भीषणतम डबवाली अग्निकांड के पीडि़तों को शायद अब मुआवजा मिल जाए, मगर 18 साल की जद्दोजहद के बाद उन्हें अपनों के बदले मिलने वाला यह मुआवजा भा नहीं रहा।
सभी वो दिन नहीं भुला पा रहे, जब वे इलाज भी नहीं करवा पा रहे थे। एक तरफ अपनों के खोने का गम। दूसरी तरफ जख्मी शरीर। उस पर पैसे की किल्लत। वो बार-बार गुहार लगाते। सरकार आश्वासन देती, मगर जमीनी हकीकत नहीं बदली। भास्कर ने जब उनसे बात की तो ज्यादातर सुबक पड़े।
प्रेमनगर कॉलोनी की रहने वाली दयानंद शर्मा की बेटी सुमन कौशल हादसे के समय पांचवे दर्जे में पढ़ती थी। सुमन बुरी तरह झुलस गई थीं। घरवालों के पास इतने पैसे नहीं थे कि अच्छा इलाज करवा सकें। किसी तरह सालों में वो ठीक हो सकीं, मगर भारी कीमत चुकाने के बाद।
सुमन याद करती हैं, 'एक दिन में पूरी जिंदगी बदल गई। हमारी तो गलती भी नहीं थी। 18 साल बाद मुआवजे का क्या मतलब? इससे वो परेशानियां तो दूर नहीं हो सकती जो हम झेल चुके।'
सुमन दूसरा तर्क भी देती हैं, 'पहले जरूरत के वक्त पैसा मिला नहीं और अब इन परिवारों को पक्के रोजगार की जरूरत है। मुआवजे का पैसा तो एक दिन खत्म हो जाना है मगर उस कांड से पैदा हुई परेशानियां तो जिंदगी भर साथ रहेंगी। मुआवजा उसी समय दे दिया जाता तो सब कुछ बदला हुआ होता'
यह बात सिर्फ सुमन के मन की नहीं, बल्कि अग्निकांड के सभी पीडि़तों की है। सुमन की तरह ज्यादातर के जख्मों को मुआवजे का यह वेवक्त मरहम राहत नहीं दे सका।
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