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इस बार बहन को दें ‘गाली त्याग’ का तोहफा

dainik bhaskar news | Jul 31, 2012, 04:16AM IST
 
 

अम्बाला. बात बेबात गाली। गुस्से में भी गाली, प्यार में भी गाली। आदत से मजबूर कई लोगों के लिए तो गाली तकिया कलाम बन जाता है।



गुस्सा किसी पर और गाली बकी जाएगी मां, बहन को। इसी लत को छुड़ाने के लिए ‘गाली छोड़ो अभियान’ के रूप में अम्बाला में अनूठी पहल हुई है। हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग के सदस्य अशोक जैन ने बेस्ट लर्निग सोसायटी के साथ मिलकर यह अभियान शुरू किया है।




इस अभियान को रक्षाबंधन पर्व के साथ जोड़ा गया। लोगों को प्रेरित किया जा रहा है कि वह राखी पर अपनी बहन को ‘गाली त्याग’ का ‘तोहफा’ दें। मुहिम रंग भी ला रही है और पहले दो दिनों में ही अम्बाला में 400 से ज्यादा लोगों ने संकल्प पत्र भर दिए हैं, डेढ़ हजार से ज्यादा ने संकल्प पत्र ले लिए हैं। वे इसे रक्षाबंधन (2 अगस्त) तक भर कर देंगे।



रविवार शाम को अम्बाला कैंट के ब्रrाकुमारी ईश्वरीय सेवा केंद्र में आयोजित कार्यक्रम में ब्रrाकुमारी बहन कृष्णा ने अभियान की शुरुआत की थी। अशोक जैन कहते हैं कि जब किसी को गाली देते सुनते थे तो बुरा लगता था। क्योंकि गाली देने के केंद्र बिंदु में समाज की सबसे पवित्र इकाई नारी होती है।



पूरा स्कूल भरेगा संकल्प फार्म: एसडी सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रिंसिपल रमेश बंसल ने कहा कि स्कूल के 1600 से ज्यादा विद्यार्थी ‘गाली छोड़ो’ अभियान का संकल्प पत्र भरेंगे। सोमवार को संकल्प पत्र बांट दिए हैं और राखी तक इन्हें भरने का काम पूरा करा लिया जाए।


गाली मनुष्य में आत्म निरीक्षण और विवेक की कमी का परिचायक है। हमारे महापुरुषों और चिंतकों ने भी वाणी पर संयम रखने का संदेश दिया है। ‘मां’ और ‘बहन’ शब्द ममता, प्रेम और पवित्रता की भावनाओं का संचार करते हैं।
ब्रह्मकुमारी बहन कृष्णा।


टिप्स गाली छोड़ने के

-जब भी हमारे मुंह से गाली निकले, अपनी डायरी में नोट कर लें सोने से पहले डायरी देखें की दिनभर में कितनी गालियां दी हैं आपने। धीरे-धीरे हमें गाली देना बुरा लगने लगेगा और आदत छूट जाएगी।

-जब भी मुंह से गाली निकले तो अपने शरीर को चिकोटी काटें (पिंच करें)। इससे हमारे अवचेतन मन में यह संदेश जाएगा कि गाली देने से शरीर को सजा मिलती है।



कानून में गाली

एडवोकेट प्रदीप श्योरान कहते हैं कि गाली देना जघन्य अपराध की श्रेणी में तो नहीं आता। आमतौर पर गाली-गलौज की स्थिति में पुलिस सीआरपीसी के तहत 107/51 का चालान काटती है।


आसान नहीं होगा छोड़ना

मनोचिकित्सक डॉ. दिव्य मंगला कहते हैं कि हर संस्कृति में कुछ शब्द नकारात्मक होते हैं। ये शब्द दूसरों की भावना आहत करने के लिए बनाए गए हैं। हम बचपन से ही ऐसे माहौल में पले-बढ़े होते हैं कि ये शब्द हमारे अवचेतन में चले जाते हैं।


उसके बाद गाली हमारी सामान्य बोलचाल का हिस्सा बन जाती है। हमारा उप-चेतन मन (सुपर इगो) चाहता है कि हम यह अभद्र भाषा इस्तेमाल न करें लेकिन अवचेतन मन के दबाव में यह शब्द बाहर आ जाता है। इसके लिए संघर्ष और अभ्यास की जरूरत है। गाली छोड़ने का संकल्प करने का मतलब है कि हम अपने उप-चेतन मन (जो अच्छी चीजें करने को प्रेरित करता है) को मजबूत करें।



ये है शपथ पत्र में

मैं ‘गाली छोड़ो अभियान’ का पूरा समर्थन करता हूं। मैं यह संकल्प लेता हूं कि मैं कभी भी गाली नहीं दूंगा और न अपने परिवार में किसी को गाली देने दूंगा।


गाली है क्या?

क्रोध के समय मुख से निकले शब्द अथवा शब्दों का समूह। जिनके उच्चारण के पश्चात व्यक्ति के हृदय को शांति का अनुभव होता है।


धर्म में भी उल्लेख

सिख धर्म- ..गुरु नानक देव जी ने कहा था कि ‘सो क्यों मंदा आखिए..जित जन्मे राजान’

हिंदू धर्म- ..‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता।’
 
 
 

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