एमडीयू का कारनामा: परीक्षा में शून्य, दोबारा जांच में दे दिए 72 अंक

रोहतक. महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी (एमडीयू) के उत्तर पुस्तिका घोटाले की स्याही अभी सूखी भी नहीं है कि विवि प्रशासन की ओर से बीते साल इंजीनियरिंग के सैकड़ों छात्रों के पुनर्मूल्यांकन घोटाले को दबा देने का सनसनीखेज मामला सामने आया है।
शून्य अंक पाने वाले छात्रों को पुनर्मूल्यांकन में 72 अंक तक देने के रोंगटे खड़े करने वाले इस घोटाले की तह तक जाने की बजाय विवि प्रशासन ने सिर्फ पुनर्मूल्यांकन करने वाले दस शिक्षकों को परीक्षक बनाने से प्रतिबंधित कर पल्ला झाड़ लिया।
विवि प्रशासन ने मामले की जांच, पैसे के लेनदेन व मिलीभगत की पड़ताल के लिए एफआईआर तक दर्ज नहीं कराई और पूरा मामला फाइलों में दफन होकर रह गया।
दिसंबर-2010 के इस पुनर्मूल्यांकन घोटाले को दबाने की भनक उत्तर पुस्तिका मामले की जांच कर रही पुलिस को अपनी पड़ताल में लग चुकी है। सूत्रों के मुताबिक, इस घोटाले का खुलासा एमडीयू की पुनर्मूल्यांकन शाखा के ही एक व्यक्ति ने पिछले साल वर्ष 23 फरवरी को कुलसचिव को पत्र लिखकर किया था।
विवि प्रशासन ने इंजीनयिरिंग के करीब सौ छात्रों को पुनर्मूल्यांकन में दोगुणे से भी अधिक अंक देने की जांच के लिए तीन प्रोफेसरों की एक कमेटी बनाई थी। इस कमेटी ने गड़बड़ी के लिए दस परीक्षकों को दो से दस साल के लिए परीक्षाओं की कॉपी जांचने से प्रतिबंधित कर दिया।
हैरानी की बात है कि कमेटी ने इसमें पुनर्मूल्यांकन शाखा की किसी भी मिलीभगत से इनकार करते हुए उसे बहुत ईमानदार करार दे दिया। साथ ही इस मामले का खुलासा करने वाले व्यक्ति को भी विश्वविद्यालय की आचार संहिता के उल्लंघन का दोषी ठहरा दिया।
(भास्कर के पास पूरे घोटाले का रोल नंबरवार विवरण व जांच प्रक्रिया के सारे दस्तावेज मौजूद हैं।) घोटाले से लाभान्वित हुए छात्रों का रिजल्ट भी तीनों परीक्षकों की जांच के औसत अंकों के आधार पर घोषित कर दिए ।
एफआईआर न कराने पर सवाल : दोबारा जांच के नाम पर नंबर बढ़वाने के इस मामले की जांच पुलिस को न सौंपने का एमडीयू प्रशासन का फैसला स्तब्ध करने वाला है। सवाल ये उठता है कि यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों पर आधारित कमेटी इस आपराधिक मामले की जांच में कितनी सक्षम है?
शिकायत के तथ्यों की पुष्टि होने के बावजूद मामला पुलिस को न सौंपा जाना अपने आप में सनसनीखेज है। सवाल यह भी उठता है कि बिना पुनर्मूल्यांकन शाखा की मिलीभगत के परीक्षकों ने कुछ छात्रों के अंक इतने बड़े पैमाने पर कैसे बढ़ा दिए?







